बिहार की राजनीति में चिराग पासवान की सक्रियता: क्या मुख्यमंत्री पद की है तैयारी?
बिहार की राजनीति में इन दिनों चिराग पासवान की चर्चा तेज़ हो गई है। केंद्रीय मंत्री और लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के प्रमुख चिराग पासवान ने हाल ही में इशारों-इशारों में यह संकेत दिए हैं कि उनका मन अब राष्ट्रीय राजनीति में नहीं लग रहा और बिहार की राजनीति उन्हें आकर्षित कर रही है। उन्होंने कहा है कि बिहार उन्हें पुकार रहा है, जिससे यह अटकलें लगाई जा रही हैं कि वे मुख्यमंत्री पद की दावेदारी की तैयारी कर रहे हैं। उनकी पार्टी के भीतर से भी यह मांग उठ रही है कि चिराग को मुख्यमंत्री पद का चेहरा बनाया जाए। इस बीच राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के शीर्ष नेतृत्व ने भी उन्हें विधानसभा चुनाव तक बिहार में अधिक समय बिताने का सुझाव दिया है।
हाल ही में चिराग पासवान ने मीडिया से बातचीत में कहा कि उनका ध्यान ‘बिहार फर्स्ट, बिहारी फर्स्ट’ की सोच पर है और बिहार की पुकार को वह अनसुना नहीं कर सकते। उन्होंने यह भी बताया कि जहां उनके पिता रामविलास पासवान की रुचि राष्ट्रीय राजनीति में थी, वहीं उनकी खुद की प्राथमिकता राज्य की राजनीति है। हालांकि उन्होंने किसी खास रणनीति का खुलासा नहीं किया, लेकिन उनकी पार्टी की युवा इकाई द्वारा पटना में आयोजित सम्मेलन में उन्हें न केवल विधानसभा चुनाव लड़ने की अपील की गई, बल्कि कई नेताओं ने तो उन्हें बिहार का अगला मुख्यमंत्री तक बताना शुरू कर दिया।
यह बयानबाज़ी ऐसे वक्त में हो रही है जब एनडीए के घटक दलों के बीच विधानसभा की 243 सीटों के बंटवारे को लेकर बातचीत शुरू हो चुकी है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चिराग पासवान के इन बयानों का उद्देश्य सीट बंटवारे में अपनी पार्टी के लिए अधिक सीटें सुनिश्चित करना है। उन्होंने भले ही सीटों की संख्या स्पष्ट रूप से नहीं बताई हो, लेकिन वे कह चुके हैं कि हर जिले में एक सीट पर उनकी पार्टी चुनाव लड़ेगी, जिसका मतलब है कि वे बिहार के सभी 38 जिलों में अपनी उपस्थिति दर्ज कराना चाहते हैं। इस बीच हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा (हम) भी 40 सीटों की मांग कर रही है।
लोकसभा चुनाव में शानदार प्रदर्शन के आधार पर लोजपा (रामविलास) ज्यादा सीटों की मांग कर रही है। पार्टी ने एनडीए के तहत मिली पांचों लोकसभा सीटों पर जीत दर्ज की थी। इसी के आधार पर पार्टी का दावा है कि हर लोकसभा सीट पर औसतन आठ विधानसभा सीटें आती हैं, इस तरह वे लगभग 40 विधानसभा सीटें मांग रहे हैं। हालांकि कुछ विश्लेषकों का मानना है कि चिराग की नजर फिलहाल 2030 के विधानसभा चुनाव पर है और वे इस बार खुद चुनाव नहीं लड़ेंगे, बल्कि पार्टी को मजबूत करने पर ध्यान देंगे।
साल 2020 के विधानसभा चुनाव में लोजपा ने 135 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ा था, जिसमें केवल एक सीट पर जीत मिली थी और 5.6 फीसदी वोट मिले थे। लोजपा ने अधिकांश सीटों पर जेडीयू के खिलाफ उम्मीदवार उतारे थे, जिससे जेडीयू को भारी नुकसान हुआ और वह 71 से घटकर 43 सीटों पर सिमट गई, जबकि बीजेपी ने 74 सीटें जीत लीं। इसके बाद लोजपा को अंदरूनी बगावत का भी सामना करना पड़ा, जब पार्टी के छह में से पांच सांसदों ने चिराग के खिलाफ मोर्चा खोल दिया और उनके चाचा पशुपति पारस ने बगावत का नेतृत्व किया। इस संकट के बाद चिराग ने अपनी पार्टी को फिर से खड़ा किया और लोकसभा चुनाव में तीसरी सबसे बड़ी पार्टी बनने का गौरव प्राप्त किया।
अब जब चिराग पासवान खुद को एक बार फिर बिहार की राजनीति में स्थापित करने की दिशा में सक्रिय नजर आ रहे हैं, तो यह साफ है कि उनकी महत्वाकांक्षा मुख्यमंत्री पद तक पहुंचने की है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या उनकी ये रणनीति रंग लाएगी या राजनीति की बदलती बिसात में उन्हें और इंतजार करना पड़ेगा।
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