बांग्लादेश में चुनाव से पहले बीएनपी का सियासी दांव, अवामी लीग समर्थकों को सुरक्षा और एकता का संदेश
बांग्लादेश में 12 फरवरी को होने वाले आम चुनाव से पहले राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं। बीएनपी, जमात-ए-इस्लामी और अन्य दल पूरे जोर-शोर से चुनाव प्रचार में जुटे हैं। इस बीच बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) ने एक नई रणनीति अपनाते हुए अवामी लीग के समर्थकों को साधने की कोशिश शुरू कर दी है। चुनावी रैलियों और सभाओं में बीएनपी नेता लगातार यह संदेश दे रहे हैं कि उनकी सरकार बनने पर किसी निर्दोष व्यक्ति को सजा नहीं दी जाएगी और सभी नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाएगी।
बीएनपी के महासचिव मिर्जा फखरुल इस्लाम आलमगीर ने चुनाव प्रचार के दौरान साफ तौर पर कहा कि बीते कई वर्षों में आम लोगों को स्वतंत्र और निष्पक्ष तरीके से मतदान करने का अवसर नहीं मिला। उन्होंने आरोप लगाया कि पहले वोटिंग प्रक्रिया पर सवाल उठते रहे हैं, लेकिन अब जनता के पास बदलाव का मौका है। मिर्जा फखरुल ने अवामी लीग के कार्यकर्ताओं और समर्थकों को संबोधित करते हुए कहा कि जिन्होंने कोई गलत काम नहीं किया है, उन्हें डरने की जरूरत नहीं है और बीएनपी उनके साथ खड़ी है।
शेख हसीना का जिक्र करते हुए मिर्जा फखरुल ने कहा कि उनके देश छोड़कर जाने से स्थानीय स्तर पर अवामी लीग के समर्थकों की स्थिति असुरक्षित हो गई है। उन्होंने दावा किया कि बीएनपी का उद्देश्य किसी से बदला लेना नहीं, बल्कि कानून के दायरे में रहकर न्याय सुनिश्चित करना है। उनके अनुसार, जिन्होंने अपराध किया है, उन्हें सजा मिलेगी, लेकिन निर्दोष लोगों को किसी भी तरह से प्रताड़ित नहीं किया जाएगा। यह बयान ऐसे समय आया है, जब अंतरिम सरकार के दौरान अवामी लीग समर्थकों पर कार्रवाई और उत्पीड़न के आरोप लगते रहे हैं।
चुनाव प्रचार के दौरान बीएनपी ने धार्मिक एकता और सामाजिक सौहार्द को भी प्रमुख मुद्दा बनाया है। मिर्जा फखरुल ने हिंदू-मुस्लिम एकता पर जोर देते हुए कहा कि बांग्लादेश सभी धर्मों का साझा देश है, जहां मुस्लिम, हिंदू, बौद्ध और ईसाई सदियों से साथ रहते आए हैं। उन्होंने कहा कि कुछ ताकतें समाज को बांटने की कोशिश कर रही हैं, लेकिन बीएनपी विकास और एकता के रास्ते पर चलने में विश्वास रखती है। पार्टी का दावा है कि सत्ता में आने पर सभी समुदायों को समान सुरक्षा और अधिकार दिए जाएंगे।
गौरतलब है कि इस बार चुनाव में शेख हसीना की अवामी लीग हिस्सा नहीं ले पा रही है, क्योंकि चुनाव आयोग ने पार्टी पर प्रतिबंध लगा दिया है। ऐसे में बीएनपी का फोकस उन मतदाताओं पर है, जो पहले अवामी लीग के समर्थक रहे हैं। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि ‘बांग्लादेश पहले’ और सभी नागरिकों की सुरक्षा जैसे नारों के जरिए बीएनपी खुद को एक समावेशी विकल्प के रूप में पेश करना चाहती है। आने वाले दिनों में यह रणनीति मतदाताओं पर कितना असर डालती है, यह चुनावी नतीजों से ही साफ हो पाएगा।
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