बिहार में ओवैसी की चाल ने बढ़ाई महागठबंधन की मुश्किलें, लालू-राहुल पशोपेश में, नहीं मिल रहा समाधान
बिहार की सियासत एक बार फिर असदुद्दीन ओवैसी के राजनीतिक दांव से उलझ गई है। जैसे-जैसे विधानसभा चुनाव करीब आ रहे हैं, राज्य की राजनीति में हलचल तेज हो रही है। राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) की अगुवाई वाले महागठबंधन के लिए ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम एक बड़ी उलझन बनकर सामने आई है। हाल ही में एआईएमआईएम ने महागठबंधन में शामिल होने की औपचारिक पेशकश करते हुए आरजेडी प्रमुख लालू प्रसाद यादव को एक पत्र लिखा, जिससे राजनीतिक समीकरण और जटिल हो गए हैं।
ओवैसी की पार्टी ने दावा किया है कि अगर उन्हें महागठबंधन में जगह मिलती है तो इससे धर्मनिरपेक्ष मतों का विभाजन रुकेगा और बीजेपी को सीधा फायदा नहीं होगा। लेकिन महागठबंधन, खासकर कांग्रेस, इस प्रस्ताव को लेकर गंभीर असमंजस में है। कांग्रेस के रणनीतिकारों का मानना है कि ओवैसी को साथ लेना बीजेपी की ‘हिंदू बनाम मुस्लिम’ राजनीति को बल देगा और इससे बीजेपी को ध्रुवीकरण का मौका मिलेगा।
ओवैसी पहले ही बिहार की राजनीति में अपनी ताकत दिखा चुके हैं। 2020 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने सीमांचल क्षेत्र में पांच सीटों पर जीत दर्ज कर सभी को चौंका दिया था। इसी प्रदर्शन की वजह से महागठबंधन बहुमत से 12 सीटें पीछे रह गया था। बाद में ओवैसी के चार विधायक आरजेडी में शामिल हो गए, जबकि पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष अख्तरुल ईमान अकेले एआईएमआईएम विधायक बचे।
अब ईमान ने 2 जुलाई को एक औपचारिक पत्र लिखकर फिर से महागठबंधन में शामिल होने की इच्छा जताई है। उन्होंने यह भी कहा कि पिछली बार भी पार्टी गठबंधन का हिस्सा बनना चाहती थी, लेकिन उसे जगह नहीं मिली। इस बार ओवैसी ने सीधे कांग्रेस और वाम दलों से भी संपर्क साधा है, ताकि धर्मनिरपेक्ष वोट एकजुट किए जा सकें।
हालांकि, कांग्रेस इस पूरे घटनाक्रम को ‘राजनीतिक चाल’ मान रही है। उसे आशंका है कि ओवैसी जानबूझकर यह दिखाना चाहते हैं कि वह बीजेपी के खिलाफ हैं और अगर उन्हें गठबंधन से बाहर रखा गया तो इसका दोष विपक्ष पर जाएगा। इस तरह, ओवैसी खुद को सेकुलर मतदाताओं के सामने ‘पवित्र विकल्प’ के तौर पर पेश कर सकते हैं और अपना वोट बैंक सुरक्षित रख सकते हैं।
इस रणनीति को भांपते हुए अब तक महागठबंधन की ओर से एआईएमआईएम के पत्र का कोई सीधा जवाब नहीं दिया गया है। कोशिश यह है कि कोई स्पष्ट ‘ना’ भी न कहनी पड़े और ओवैसी अपने आप अलग हो जाएं। लेकिन सियासी दबाव बढ़ता जा रहा है और अब सबकी नजरें 9 जुलाई को राहुल गांधी और तेजस्वी यादव की प्रस्तावित मुलाकात पर टिकी हैं, जिसमें इस मामले पर अंतिम फैसला लिए जाने की संभावना है।
बिहार की राजनीति में ओवैसी की मौजूदगी और सीमांचल में उनका प्रभाव एक निर्णायक कारक बन चुका है। सवाल यह है कि क्या महागठबंधन उन्हें साथ लेकर धर्मनिरपेक्ष एकता को मजबूती देगा या फिर राजनीतिक जोखिम से बचते हुए उन्हें बाहर रखेगा और इसका लाभ बीजेपी को होगा। इन सवालों के जवाब आने वाले दिनों में बिहार की चुनावी दिशा तय करेंगे।
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