April 20, 2026

बरेली स्मार्ट सिटी: 6 करोड़ के टॉयलेट्स बन गए खंडहर, सरकारी धन की लूट का शक

बरेली स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट में बड़े पैमाने पर घोटाले के संकेत मिल रहे हैं, जहां जनता के मेहनत की कमाई को ठेकेदारों और अफसरों की मिलीभगत से लूटा जा रहा है। बरेली में बनाए गए 9 स्मार्ट बायो टॉयलेट्स की कीमत को लेकर बड़ा सवाल उठ रहा है। इन टॉयलेट्स की लागत करीब 50 करोड़ रुपये बताई जा रही है, लेकिन दो साल बाद भी ये चालू नहीं हो सके और अब खंडहर में तब्दील हो गए हैं। खास बात यह है कि इन टॉयलेट्स की कीमत एक-एक यूनिट पर 6 करोड़ रुपये बताई गई है, जो साधारण टीन से बने हैं। जनता का सवाल है कि एक साधारण टॉयलेट की कीमत 6 करोड़ रुपये कैसे हो सकती है? क्या इन टॉयलेट्स में सोना-चांदी का इस्तेमाल किया गया है?

आखिर क्यों नहीं खुल सके टॉयलेट्स?

ये टॉयलेट्स 7 दिसंबर 2022 को उद्घाटन के बाद जनता के लिए खोले जाने का दावा किया गया था, लेकिन दो साल बाद भी इनका कोई खास उपयोग नहीं हो पाया। बरेली नगर निगम ने केंद्र सरकार की स्मार्ट सिटी योजना के तहत 1200 करोड़ रुपये की फंडिंग प्राप्त की थी, लेकिन इस धन का सही तरीके से उपयोग नहीं हो रहा है। अब सवाल उठ रहा है कि 6 लाख रुपये में बनने वाले टॉयलेट्स पर 6 करोड़ रुपये खर्च कर दिए गए, यह सीधे-सीधे सरकारी धन की लूट को दर्शाता है।

जर्जर हालत में पड़े टॉयलेट्स:

वह टॉयलेट्स, जिनका उद्देश्य बाजारों में सार्वजनिक शौचालयों की सुविधा देना था, अब बेकार पड़े हैं। जनता को खुले में शौच करने के लिए मजबूर किया जा रहा है, और स्वच्छ भारत मिशन की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। इन टॉयलेट्स को बनाने का दावा किया गया था कि ये जनता की सुविधा के लिए बनाए जाएंगे, लेकिन दो साल बाद भी ये चालू नहीं हो सके और अब खंडहर में तब्दील हो गए हैं।

संजय कम्युनिटी हॉल में भी घोटाला:

संजय कम्युनिटी हॉल में भी इसी तरह का एक बड़ा घोटाला सामने आया है। वहां पर्याप्त जगह होने के बावजूद एक स्थायी टॉयलेट नहीं बनाया गया, जबकि 6 करोड़ रुपये खर्च करके टीन के टॉयलेट्स लगाए गए, जो अब जर्जर हो चुके हैं। यह सवाल उठता है कि इतने बड़े बजट में यदि आधुनिक सुविधाओं से लैस टॉयलेट्स बनाए जा सकते थे, तो ऐसा क्यों नहीं किया गया? यह पूरी स्थिति अफसरों और ठेकेदारों की मिलीभगत का संकेत देती है।

गरीबों को 2.5 लाख में घर, वहीं टॉयलेट पर 6 करोड़ रुपये खर्च:

सवाल यह भी है कि जहां गरीबों को प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत घर बनाने के लिए मात्र 2.5 लाख रुपये की मदद दी जाती है, वहीं 6 करोड़ रुपये खर्च कर एक टॉयलेट बनाया जा रहा है। यह आंकड़ा साफ तौर पर सरकारी अफसरों और ठेकेदारों की साजिश को उजागर करता है, जो जनता के पैसे का दुरुपयोग कर रहे हैं।

सिविल सोसायटी का विरोध:

इस घोटाले के खिलाफ सिविल सोसायटी ने आवाज उठाई है। सोसायटी के अध्यक्ष राज नारायण गुप्ता ने कहा कि जनता के पैसे से बने इन टॉयलेट्स का दो साल बाद भी चालू न होना, साफ तौर पर सरकारी लापरवाही और भ्रष्टाचार का मामला है। एक महिला सामाजिक कार्यकर्ता ने बताया कि बरेली में सार्वजनिक शौचालयों की भारी कमी है, और महिलाओं को सबसे ज्यादा परेशानी हो रही है क्योंकि किला से कुतुबखाना तक 4 किलोमीटर की दूरी में कोई शौचालय नहीं है।

क्या होगी कार्रवाई या फिर…?:

इस घोटाले ने बरेली नगर निगम की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जनता अब इस मामले की उच्च स्तरीय जांच और दोषियों पर सख्त कार्रवाई की मांग कर रही है, लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या सरकार इस पर सख्त कदम उठाएगी या फिर यह मामला भी अन्य घोटालों की तरह दबा दिया जाएगा? यह समय बताएगा कि जनता को न्याय मिलेगा या फिर घोटालेबाजों के हौसले और बुलंद होंगे।

बरेली नगर निगम के घोटालों का अंबार:

बरेली नगर निगम और स्मार्ट सिटी में और भी कई घोटाले सामने आ रहे हैं, जिनकी परतें धीरे-धीरे खुल रही हैं। नगर निगम के तमाम घोटाले हैं जिनमें सरकारी धन का जमकर दुरुपयोग किया जा रहा है। आने वाले दिनों में यह घोटाले और भी बड़े रूप में सामने आ सकते हैं। सवाल यह है कि क्या सरकार इन घोटालों पर कार्रवाई करेगी या जनता को फिर से धोखा दिया जाएगा?

घोटाले की सियासत:

यह मामला न केवल भ्रष्टाचार की ओर इशारा करता है, बल्कि यह भी बताता है कि किस तरह से बड़े-बड़े प्रोजेक्ट्स का लाभ कुछ लोगों के हाथों में जाता है। बरेली के इस स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट में हुई लापरवाही और सरकारी धन की लूट का पर्दाफाश होना जरूरी है, ताकि ऐसे घोटालों को भविष्य में रोका जा सके।

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