अयोध्या: हनुमानगढ़ी में 300 साल पुरानी परंपरा टूटी, राम मंदिर के दर्शन के लिए बाहर निकले महंत प्रेम दास
उत्तर प्रदेश के अयोध्या में स्थित प्राचीन और अत्यंत प्रतिष्ठित हनुमानगढ़ी मंदिर में तीन शताब्दियों से चली आ रही एक गहरी धार्मिक परंपरा टूट गई। यह ऐतिहासिक क्षण अक्षय तृतीया के शुभ अवसर पर सामने आया, जब पीठ के वर्तमान पीठाधीश्वर महंत प्रेम दास पहली बार मंदिर परिसर से बाहर निकले और भगवान राम के नवनिर्मित भव्य मंदिर के दर्शन करने पहुंचे। हनुमानगढ़ी के इतिहास में यह पहली बार हुआ जब किसी महंत ने अपने जीवनकाल में मंदिर से बाहर निकलने का निर्णय लिया। परंपरा के अनुसार, महंत बनने के बाद वह हनुमानजी को पूर्णतः समर्पित हो जाते हैं और उनका पूरा जीवन मंदिर परिसर में ही बीतता है। उनका शरीर भी मृत्यु के बाद ही परिसर से बाहर जाता है।
महंत प्रेम दास की इच्छा थी कि वे श्रीराम जन्मभूमि मंदिर के भव्य स्वरूप के दर्शन करें। उनकी इस भावना को देखते हुए निर्वाणी अखाड़े के पंच परमेश्वर ने उन्हें विशेष रूप से एक बार परिसर से बाहर जाने की अनुमति दी। इस ऐतिहासिक क्षण को और भी गौरवपूर्ण बनाने के लिए जब महंत मंदिर से बाहर निकले तो एक भव्य शाही जुलूस निकाला गया, जिसमें उनके शिष्य, नागा साधु और बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल हुए। यह दृश्य भावनात्मक और अद्भुत था, जिसने एक अध्यात्मिक इतिहास को नई दिशा दी।
हनुमानगढ़ी के वरिष्ठ महंत संजय दास ने बताया कि इस परंपरा का पालन वर्ष 1737 से किया जा रहा है और इसे इतना गंभीरता से लिया गया है कि अदालतों ने भी कई बार इस परंपरा का सम्मान किया है। उन्होंने यह भी बताया कि 1980 के दशक में जब किसी मामले में महंत का बयान दर्ज करना था तो अदालत ने स्वयं मंदिर परिसर में सुनवाई आयोजित की थी, ताकि परंपरा भंग न हो।
हनुमानगढ़ी मंदिर को अयोध्या का अत्यंत सिद्ध स्थल माना जाता है और मान्यता है कि श्रीराम के दर्शन करने से पहले हनुमानजी के दर्शन आवश्यक माने जाते हैं। ऐसे में यह निर्णय धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण बन गया। महंत प्रेम दास का यह कदम न केवल परंपरा में एक नई लचीलेपन की शुरुआत है, बल्कि यह यह भी दर्शाता है कि श्रद्धा और भावना के विशेष अवसरों पर परंपराएं समय के अनुरूप नए मार्ग भी अपना सकती हैं।
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