मच्छरों को ही मलेरिया मुक्त करने की क्रांति: नई दवाओं से खत्म होगा जानलेवा परजीवी?
अमेरिकी शोधकर्ताओं ने मलेरिया के खिलाफ एक ऐसी क्रांतिकारी खोज की है, जो मच्छरों को ही इस जानलेवा बीमारी से मुक्त कर सकती है। लेकिन क्या यह नया तरीका मलेरिया के खिलाफ जंग में पूरी तरह से असरदार साबित होगा? आइए जानते हैं, कैसे यह शोध मलेरिया से लड़ने के पुराने तरीकों को चुनौती दे रहा है और भविष्य में क्या बदलाव ला सकता है।
मलेरिया एक घातक बीमारी है, जो हर साल दुनियाभर में छह लाख से अधिक लोगों की जान लेती है, जिनमें ज़्यादातर बच्चे होते हैं। इस बीमारी का मुख्य कारण मादा मच्छरों द्वारा इंसानों में मलेरिया के परजीवी यानी पैरासाइट्स का प्रवेश है। अब तक मलेरिया से लड़ने के लिए सबसे ज्यादा मच्छरों को मारने वाले कीटनाशकों का उपयोग किया जाता रहा है। लेकिन ये कीटनाशक अब कई जगह मच्छरों पर असर नहीं कर रहे क्योंकि मच्छर उनमें रेजिस्टेंट हो चुके हैं।
हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने इस समस्या का एक नया समाधान खोजा है। उन्होंने दो ऐसी दवाएं विकसित की हैं, जो सीधे मच्छरों के अंदर मौजूद मलेरिया के परजीवियों को पूरी तरह खत्म कर सकती हैं। यानी, अब मच्छरों को मारने की बजाय, उनकी अंदर की बीमारी को समाप्त करने की रणनीति अपनाई जा रही है। यह नज़रिया पुरानी सोच से बिल्कुल अलग है, क्योंकि अब मच्छरों को मारने की बजाय उनके अंदर मौजूद परजीवियों को निशाना बनाया जाएगा।
शोधकर्ता डॉ. एलेक्जेंड्रा प्रोबस्ट बताती हैं कि मच्छरों में मलेरिया के परजीवियों को मारने की दिशा में अब तक कोई कदम नहीं उठाया गया था, क्योंकि फोकस सिर्फ मच्छरों को खत्म करने पर था। लेकिन अब यह सोच बदल रही है। उन्होंने बताया कि मच्छरदानी पर इन दवाओं के मिश्रण का कोट लगाने की योजना है, जिससे मच्छर नेट के संपर्क में आते ही उनके अंदर मौजूद परजीवी मर जाएंगे और वे आगे मलेरिया का संक्रमण फैला नहीं पाएंगे।
यह तरीका इसलिए भी खास है क्योंकि मलेरिया के परजीवियों में दवाओं के प्रति रेजिस्टेंट बनने की संभावना कम होती है। मादा मच्छरों में मलेरिया के परजीवी सिर्फ पाँच से कम संख्या में होते हैं, जबकि मानव शरीर में अरबों की संख्या में। इसलिए मच्छरों में परजीवियों को खत्म करना अधिक प्रभावी साबित हो सकता है।
इस शोध के लिए वैज्ञानिकों ने कई संभावित दवाओं की एक लंबी सूची बनाई और 22 दवाओं को चुना। फिर उन्हें मादा मच्छरों पर ट्रायल किया जिनमें मलेरिया के परजीवी थे। इन ट्रायल में दो दवाएं ऐसी पाई गईं, जो परजीवियों को 100 प्रतिशत खत्म कर देती हैं। इन दवाओं को मच्छरदानी जैसी चीज़ों पर लगाने पर शोधकर्ता आश्वस्त हुए कि इसका प्रभाव कम से कम एक साल तक रहता है, जो इसे कीटनाशकों के मुकाबले सस्ता और दीर्घकालिक विकल्प बनाता है।
हालांकि यह प्रयोग अभी लैब तक ही सीमित है, लेकिन अगले चरण के लिए इथियोपिया में फील्ड टेस्ट तय किए गए हैं, जहाँ यह देखा जाएगा कि क्या मच्छरदानियों पर लगाए गए मलेरिया-रोधी दवाएं वास्तविक जीवन में भी उतनी ही कारगर हैं। इस परीक्षण की पूरी प्रक्रिया छह साल तक चल सकती है।
वैज्ञानिकों का मानना है कि मलेरिया से बचाव के लिए मच्छरदानी का इस्तेमाल अब भी सबसे प्रभावी तरीका है। कई इलाकों में मच्छरदानियों पर इनसेक्टिसाइड भी लगाए जाते हैं, जो मच्छरों को मार देते हैं। लेकिन चूंकि कई मच्छर इन कीटनाशकों के प्रति रेजिस्टेंट हो चुके हैं, इसलिए मच्छरदानियों पर मलेरिया रोधी दवाओं का कोटिंग एक नई और प्रभावी रणनीति साबित हो सकती है।
अगले कुछ वर्षों में मच्छरों में मलेरिया के परजीवियों को खत्म करने की यह नई विधि मलेरिया के खिलाफ लड़ाई में बड़ा बदलाव ला सकती है। जब तक यह पूरी तरह से परीक्षण और पुष्टि हो, तब तक मच्छरदानी का नियमित इस्तेमाल और वैक्सीन के जरिए बच्चों की सुरक्षा ही मलेरिया से बचाव का सबसे भरोसेमंद उपाय होगा।
क्या मच्छरों को ही बीमारी से छुटकारा दिलाकर मलेरिया को जड़ से खत्म किया जा सकेगा? वक्त ही बताएगा, लेकिन यह नई खोज मलेरिया के खिलाफ एक उम्मीद की किरण जरूर है।
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