बांग्लादेश में तख़्तापलट के बाद अवामी लीग पर शिकंजा: एक साल में 44 हज़ार कार्यकर्ता गिरफ्तार
पुलिस रिपोर्ट में चौंकाने वाला खुलासा, सबसे ज़्यादा गिरफ्तारियां चिटगांव से — विपक्ष को कुचलने की रणनीति पर उठे सवाल
बांग्लादेश में पिछले साल 5 अगस्त को हुए तख्तापलट के बाद से शेख हसीना की पार्टी अवामी लीग लगातार दबाव में है। तख्तापलट के बाद शेख हसीना को देश छोड़ना पड़ा और पार्टी पर पाबंदी लगा दी गई। इसके बावजूद अवामी लीग कार्यकर्ता जगह-जगह विरोध और जुलूस निकालते रहे, जिसका नतीजा यह हुआ कि बीते 13 महीनों में पुलिस ने भारी संख्या में गिरफ्तारियां कीं। एक आधिकारिक रिपोर्ट बताती है कि 5 अगस्त 2024 से 3 सितंबर 2025 तक कुल 44,472 अवामी लीग और सहयोगी संगठनों के कार्यकर्ताओं को हिरासत में लिया गया।
इनमें से 32,371 लोगों को अदालत से ज़मानत मिल चुकी है, जो कुल गिरफ्तारियों का लगभग 73 प्रतिशत है। यह आंकड़ा कई सवाल खड़े करता है—अगर इतने बड़े पैमाने पर गिरफ्तार लोग दोषी थे तो उन्हें इतनी आसानी से ज़मानत क्यों मिल गई? वहीं, सरकार इसे “कानून व्यवस्था बनाए रखने की कार्रवाई” बता रही है, जबकि विपक्ष इसे सत्ता में वापसी की कोशिश कर रहे कार्यकर्ताओं को कुचलने का प्रयास मान रहा है।
ढाका मेट्रोपॉलिटन पुलिस के आंकड़ों के अनुसार, राजधानी में अवामी लीग और प्रतिबंधित छात्र लीग से जुड़े जुलूस और प्रदर्शनों पर काबू पाने के लिए 97 मामले आतंकवाद-रोधी अधिनियम के तहत दर्ज किए गए। इन मामलों में 1,123 लोगों को गिरफ्तार किया गया था, जिनमें से 403 पहले ही जमानत पर बाहर आ चुके हैं। इसके अलावा, 24 सितंबर को अवामी लीग की प्रस्तावित मार्च को रोकने के लिए पुलिस ने सख़्ती दिखाई और 244 लोगों को हिरासत में ले लिया।
अगर क्षेत्रवार नज़र डालें तो चिटगांव रेंज में सबसे अधिक 7,823 गिरफ्तारियां हुईं, जिनमें से 6,275 को जमानत मिल गई। वहीं, ढाका में 7,355 गिरफ्तारियां हुईं लेकिन यहां ज़मानत का प्रतिशत केवल 65 रहा। सिलहट रेंज में सबसे कम 1,398 गिरफ्तारियां दर्ज की गईं, जिनमें से 1,174 (84%) को राहत मिली। राजशाही, खुलना, बरिसाल, रंगपुर और माइमेनसिंह में भी हजारों कार्यकर्ताओं को जेल भेजा गया, लेकिन उनमें से अधिकांश अब ज़मानत पर बाहर हैं।
इसी बीच, इतनी बड़ी संख्या में ज़मानत मिलने पर सरकार ने चिंता जताई है। 14 सितंबर को हुई एक उच्चस्तरीय बैठक में गृह मंत्रालय के संयुक्त सचिव की अध्यक्षता में चार सदस्यीय समिति गठित की गई। इसमें कानून मंत्रालय, अटॉर्नी जनरल दफ्तर और पुलिस के अधिकारी शामिल हैं। समिति को यह जांचने का ज़िम्मा सौंपा गया है कि आखिर आतंकवाद-रोधी कानून जैसे गंभीर मामलों में भी कार्यकर्ताओं को इतनी आसानी से ज़मानत कैसे मिल रही है।
कुल मिलाकर, बांग्लादेश की राजनीति इस वक्त गहरे संकट में है। जहां अवामी लीग अपनी मौजूदगी बचाने की कोशिश कर रही है, वहीं प्रशासन और पुलिस उस पर शिकंजा कसने में जुटे हैं। आने वाले 2026 के चुनाव से पहले यह सख्ती और तेज़ हो सकती है। लेकिन बड़ा सवाल यही है कि क्या इतने बड़े पैमाने पर की गई गिरफ्तारियां विपक्ष को दबाने का तरीका हैं या वाकई कानून व्यवस्था बनाए रखने की मजबूरी?
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