नेपाल में अंतरिम सरकार के तुरंत बाद चुनावी ऐलान, बांग्लादेश में देरी क्यों?
भारत के पड़ोसी देशों नेपाल, श्रीलंका और बांग्लादेश की हालिया राजनीतिक घटनाओं ने यह साफ कर दिया है कि एक जैसे हालात होने के बावजूद अलग-अलग देशों की लोकतांत्रिक प्रक्रिया कितनी भिन्न हो सकती है। नेपाल ने जहां अंतरिम सरकार बनने के अगले ही दिन चुनाव की तारीख घोषित कर दी, वहीं बांग्लादेश एक साल से ज्यादा वक्त बीत जाने के बाद भी चुनावी तारीख तय नहीं कर पाया है।
नेपाल की राजनीति में हाल ही में बड़ा बदलाव देखने को मिला। प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने जन आंदोलनों और खासतौर से Gen-Z प्रदर्शनकारियों के दबाव में 9 सितंबर 2025 को इस्तीफा दिया। इसके बाद राष्ट्रपति रामचंद्र पौडेल ने पूर्व मुख्य न्यायाधीश सुशीला कार्की को अंतरिम सरकार का प्रमुख बनाया। दिलचस्प बात यह रही कि 13 सितंबर को ही संसद को भंग कर दिया गया और अगले साल 5 मार्च 2026 को चुनाव कराने का ऐलान कर दिया गया। यह तेजी नेपाल की पहले से मजबूत लोकतांत्रिक संस्थाओं, राजनीतिक सहमति और निर्वाचन आयोग की तैयारियों की वजह से संभव हो पाया।
श्रीलंका का अनुभव भी नेपाल जैसा ही रहा। वहां जुलाई 2022 में गोटाबाया राजपक्षे ने आर्थिक संकट और विरोध प्रदर्शनों के दबाव में इस्तीफा दिया था। इसके बाद संवैधानिक प्रावधानों के तहत रानिल विक्रमसिंघे को अंतरिम राष्ट्रपति नियुक्त किया गया और निर्धारित समय में चुनाव हुए। आखिरकार 2024 में अनुरा कुमार दिसानायके राष्ट्रपति चुने गए। इस उदाहरण से यह स्पष्ट होता है कि संवैधानिक ढांचा और राजनीतिक सहमति किसी भी देश की चुनावी प्रक्रिया को सुचारू रूप से आगे बढ़ाने में निर्णायक भूमिका निभाते हैं।
इसके उलट बांग्लादेश में स्थिति कहीं अधिक जटिल है। अगस्त 2024 में शेख हसीना के इस्तीफे के बाद नोबेल पुरस्कार विजेता मुहम्मद यूनुस को अंतरिम सरकार का मुख्य सलाहकार बनाया गया। लेकिन एक साल बीतने के बावजूद वहां चुनाव नहीं हो सके। यूनुस सरकार ने पहले जून 2026 और बाद में फरवरी 2026 में चुनाव कराने का संकेत दिया, लेकिन राजनीतिक दलों के बीच गहरे मतभेद और संस्थागत सुधारों की मांग के चलते तारीख अब तक तय नहीं हो पाई। यूनुस का तर्क है कि जब तक संविधान, न्यायपालिका और चुनावी तंत्र में सुधार नहीं होते, तब तक चुनाव कराना देश को फिर पुराने ढर्रे पर ले जाएगा।
बांग्लादेश में अंतरिम सरकार पर दबाव कई दिशाओं से है। विपक्षी दल तुरंत चुनाव चाहते हैं, जबकि यूनुस सरकार सुधारों पर जोर दे रही है। सेना के साथ भी रिश्ते तनावपूर्ण होते जा रहे हैं, जो राजनीतिक अस्थिरता को और बढ़ा रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर जल्दबाजी में चुनाव हुए तो राजनीतिक अस्थिरता और बढ़ सकती है, जबकि सुधारों के बाद चुनाव कराए जाने पर लोकतांत्रिक ढांचे को मजबूती मिलेगी।
इन घटनाओं से यह साफ है कि नेपाल और श्रीलंका की तुलना में बांग्लादेश का लोकतांत्रिक ढांचा कमजोर है और वहां राजनीतिक सहमति का अभाव है। यही वजह है कि नेपाल ने जहां तेजी से चुनावी रोडमैप तय कर लिया, वहीं बांग्लादेश अब भी अनिश्चितता और खींचतान में फंसा हुआ है।
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