April 29, 2026

‘जुगनुमा – द फैबल’ रिव्यू: मनोज बाजपेयी की सोचने पर मजबूर करने वाली फिल्म

फिल्म निर्माता राम रेड्डी की नई फिल्म ‘जुगनुमा – द फैबल’ अब सिनेमाघरों में रिलीज हो चुकी है। मनोज बाजपेयी, प्रियंका बोस, हीरल सिंधु और दीपक डोबरियाल जैसे सशक्त कलाकारों से सजी यह फिल्म एक फैंटेसी ड्रामा है, जो शुरू से अंत तक दर्शकों को सोचने पर मजबूर करती है। यह उन दर्शकों के लिए है, जो सिनेमा को केवल मनोरंजन नहीं बल्कि कला के रूप में देखते हैं। फिल्म धीरे-धीरे आगे बढ़ती है, लेकिन हर सीन अपने भीतर गहराई लिए हुए है। खास बात यह है कि फिल्म के अंतिम पांच मिनट तक आते-आते सभी परतें खुलती हैं और कहानी अपनी पूरी ताकत के साथ सामने आती है।

कहानी 1989 के हिमालयी वादियों में सेट की गई है। फिल्म की शुरुआत देव नामक किरदार से होती है, जिसे मनोज बाजपेयी ने निभाया है। देव अपने दादा से विरासत में मिले बगीचे और जमीन का मालिक है। वह अपनी पत्नी और बच्चों के साथ खुशहाल जीवन जी रहा होता है, लेकिन अचानक उसके बगीचे के पेड़ों में आग लगने लगती है। यह आग केवल पेड़ों को नहीं, बल्कि उसके मानसिक संतुलन को भी झकझोर देती है। धीरे-धीरे वह सब पर शक करने लगता है और खुद को अकेला कर लेता है। इसी सफर के दौरान वह अपनी जमीन, परिवार और अपनी असल पहचान को समझता है।

तकनीकी पक्ष पर गौर करें तो फिल्म को 16mm कैमरे की शैली में शूट किया गया है, जिससे यह डॉक्यूमेंट्री जैसा एहसास देती है। सुनील रामकृष्ण बोरकर का कैमरा वर्क हर फ्रेम को एक खूबसूरत तस्वीर की तरह पेश करता है। एक सीन में देव का जुगनुओं के बीच होना इतना गहरा और काव्यात्मक लगता है कि दर्शक उसे लंबे समय तक भूल नहीं पाते। राम रेड्डी ने फिल्म को बेहद सोच-समझकर गढ़ा है और कहीं भी अतिरिक्त दृश्य जोड़ने की कोशिश नहीं की। यह फिल्म दर्शकों पर भरोसा करती है और उन्हें सोचने का मौका देती है, बजाय इसके कि हर बात सीधे परोसी जाए।

अभिनय की बात करें तो मनोज बाजपेयी का काम फिल्म की जान है। उन्होंने देव के भीतर के संघर्ष, पीड़ा और अकेलेपन को इतनी बारीकी से निभाया है कि दर्शक किरदार से पूरी तरह जुड़ जाते हैं। प्रियंका बोस ने पत्नी के किरदार में प्रभावी प्रदर्शन दिया है, जबकि हीरल सिंधु (वान्या) इस फिल्म की एक नई खोज साबित हुई हैं। दीपक डोबरियाल ने भी अपने किरदार को दिल से निभाया है, खासकर वह सीन जब उन्हें बगीचे से दूर जाने को कहा जाता है। तिलोत्तमा शोम और स्थानीय कलाकारों का योगदान भी फिल्म को यथार्थ के और करीब ले जाता है।

‘जुगनुमा – द फैबल’ केवल एक फिल्म नहीं, बल्कि एक अनुभव है। यह उन दर्शकों के लिए है जो धैर्य से सिनेमा का आनंद लेना जानते हैं और निर्देशक के विज़न को समझना चाहते हैं। अंतरराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवलों में सराही जा चुकी इस फिल्म को 3.5 स्टार दिए जा सकते हैं। यह धीमी जरूर है, लेकिन असरदार है और खत्म होने के बाद भी आपकी सोच में बनी रहती है।

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