UPS: सरकारी कर्मचारियों को क्यों नहीं भा रही यूनिफाइड पेंशन स्कीम
केंद्र सरकार ने पुरानी पेंशन स्कीम (OPS) और राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली (NPS) के विकल्प के रूप में यूनिफाइड पेंशन स्कीम (UPS) की शुरुआत तो कर दी, लेकिन इसे अपेक्षित सफलता नहीं मिल पा रही है। आंकड़ों के अनुसार, अब तक लगभग 27 लाख केंद्रीय कर्मचारियों में से केवल 1 प्रतिशत ने ही इस स्कीम को चुना है। कर्मचारियों का मानना है कि इसमें पुरानी पेंशन स्कीम जैसी स्थायित्व और सुरक्षा नहीं है, जिसकी वजह से वे इसे अपनाने से बच रहे हैं।
यूपीएस की घोषणा अप्रैल 2024 में उस समय की गई थी जब कर्मचारियों और विपक्षी दलों की ओर से पुरानी पेंशन स्कीम की बहाली की मांग लगातार उठ रही थी। इसके तहत कर्मचारियों को अपने वेतन का 10 प्रतिशत योगदान देना होता है, जबकि सरकार की ओर से 18.5 प्रतिशत का योगदान किया जाता है। इस स्कीम में 25 साल या उससे अधिक सेवा करने वाले कर्मचारियों को रिटायरमेंट से पहले के 12 महीनों के औसत मूल वेतन का 50 प्रतिशत पेंशन गारंटी के तौर पर मिलता है। यह पेंशन पूरी तरह मुद्रास्फीति से जुड़ी होती है और 10 साल से अधिक सेवा करने वाले कर्मचारियों को कम से कम 10,000 रुपये की मासिक पेंशन सुनिश्चित की जाती है। पेंशनर्स की मृत्यु की स्थिति में उनके परिवार को अंतिम पेंशन का 60 प्रतिशत दिया जाता है। बावजूद इसके, कर्मचारियों को इसमें आकर्षण नहीं दिख रहा है।
कर्मचारियों की नाराजगी के पीछे कई वजहें हैं। पहला, इसमें लंबे समय तक सेवा की अनिवार्यता रखी गई है। दूसरा, मासिक कॉन्ट्रीब्यूशन की वजह से सैलरी का बड़ा हिस्सा कट जाता है। तीसरा, समय से पहले रिटायरमेंट लेने पर लाभ सीमित हो जाते हैं। चौथा, परिवारिक पेंशन की परिभाषा बहुत संकीर्ण है, जिससे अधिकांश परिवारजनों को सुरक्षा नहीं मिल पाती। इसके अलावा, सर्विस के दौरान मृत्यु होने पर मिलने वाले लाभ को लेकर भी स्पष्टता नहीं है। टैक्सेशन से जुड़े सवाल और एक बार स्कीम चुनने के बाद वापस न लौट पाने की स्थिति ने भी कर्मचारियों को हतोत्साहित किया है।
सरकार ने कर्मचारियों की आशंकाओं को कम करने के लिए कई कदम उठाए हैं। जुलाई 2025 में सरकार ने एनपीएस की तरह टैक्स बेनिफिट्स को यूपीएस पर भी लागू कर दिया, जिसमें रिटायरमेंट पर 60% फंड टैक्स-फ्री निकासी शामिल है। साथ ही, रिटायरमेंट और डेथ ग्रेच्युटी के लाभ भी जोड़े गए हैं। इसके अलावा, एनपीएस से यूपीएस और यूपीएस से एनपीएस में “वन-टाइम, वन-वे” स्विच की सुविधा भी दी गई है। फिर भी कर्मचारियों का भरोसा पूरी तरह नहीं बन पाया है।
वित्तीय दृष्टिकोण से देखें तो यूपीएस को इस तरह डिजाइन किया गया है कि इसका सरकारी खजाने पर अत्यधिक बोझ न पड़े। वित्त वर्ष 2026 में इसके कारण अनुमानित अतिरिक्त खर्च 8,500 करोड़ रुपये आंका गया है। समय के साथ यह राशि बढ़ेगी, लेकिन सरकार का दावा है कि यह नियंत्रित ढंग से बढ़ेगी। चूंकि, पेंशन कैपिटल अमाउंट कर्मचारी की मृत्यु के बाद उनके उत्तराधिकारियों को वापस नहीं किया जाएगा, इसलिए सरकार का मानना है कि भविष्य में इसका बोझ बजट पर ज्यादा नहीं पड़ेगा।
विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार ने यूपीएस को राजकोषीय अनुशासन को ध्यान में रखकर बनाया है, लेकिन इसमें कर्मचारियों को वह स्थिरता और भरोसा नहीं मिल रहा है जो उन्हें ओपीएस में मिलता था। यही कारण है कि लाखों कर्मचारियों के बीच यह स्कीम अभी तक लोकप्रिय नहीं हो पाई है।
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