डॉग स्टरलाइजेशन: दवा, एनेस्थेसिया और ऑपरेशन से लेकर पोस्ट-ऑपरेटिव केयर तक, जानें कुत्तों की नसबंदी की पूरी प्रक्रिया
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में आदेश दिया है कि अब केवल आक्रामक और रेबीज संक्रमित कुत्तों को ही शेल्टर होम में रखा जाएगा, जबकि बाकी सभी आवारा कुत्तों को नसबंदी और टीकाकरण के बाद उनकी मौजूदा जगह पर छोड़ना अनिवार्य होगा। यह कदम आवारा कुत्तों की संख्या नियंत्रित करने और इंसानों तथा जानवरों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए उठाया गया है। लेकिन सवाल यह है कि कुत्तों की नसबंदी की प्रक्रिया आखिर कैसे होती है और इसमें किन बातों का विशेष ध्यान रखा जाता है। इस बारे में गाजियाबाद के मुख्य पशु चिकित्सा अधिकारी और संयुक्त निदेशक पशुपालन विभाग, डॉ. एस. पी. पांडेय ने विस्तार से जानकारी दी।
डॉ. पांडेय के अनुसार, ऑपरेशन से पहले की तैयारी बेहद महत्वपूर्ण होती है। सबसे पहले कुत्तों को पकड़कर क्लिनिक या कैंप में लाया जाता है और फिर उन्हें कम से कम 12 घंटे तक भूखा रखा जाता है। ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि एनेस्थेसिया देने के दौरान उल्टी जैसी समस्या न हो। ऑपरेशन से पहले कुत्तों को एंटीबायोटिक और दर्द निवारक दवाएं दी जाती हैं, ताकि संक्रमण और दर्द को कम किया जा सके। इसके बाद उन्हें एनेस्थेसिया दिया जाता है, जिसका असर लगभग आधे घंटे तक रहता है। इसी समय में नसबंदी की प्रक्रिया पूरी की जाती है।
सर्जरी के दौरान, नर कुत्तों के अंडकोष (टेस्टिस) निकाल दिए जाते हैं, जबकि मादा कुत्तों की ओवरी और यूट्रस हटाई जाती है। नर कुत्तों की नसबंदी की प्रक्रिया अपेक्षाकृत आसान और जल्दी होती है, जबकि मादा कुत्तों में यह प्रक्रिया अधिक समय लेती है और सावधानी से की जाती है। पूरी सर्जरी में 30 से 45 मिनट तक का समय लगता है। ऑपरेशन के लिए एक सर्जन, एक सहायक वेटरनरियन और दो अन्य सहायक अनिवार्य होते हैं।
सर्जरी के बाद की देखभाल (Post-Operative Care) भी उतनी ही जरूरी है। कुत्ते को ऑपरेशन थिएटर से लगभग 20–25 मिनट बाद निकालकर वार्ड में शिफ्ट किया जाता है। लगभग 4–5 घंटे बाद उन्हें लिक्विड डाइट दी जाती है। नर कुत्तों को तीन दिन तक और मादा कुत्तों को पांच दिन तक विशेष देखभाल में रखा जाता है। इसके बाद उन्हें उसी जगह पर छोड़ दिया जाता है, जहां से उन्हें पकड़ा गया था। सामान्य व्यवहार में लौटने में कुत्तों को 24 से 48 घंटे का समय लगता है।
डॉ. पांडेय बताते हैं कि इंसानों और कुत्तों की नसबंदी में फर्क है। इंसानों में नसों को काटकर बांध दिया जाता है, लेकिन अंडकोष या ओवरी नहीं निकाली जाती। जबकि कुत्तों की नसबंदी में प्रजनन अंग ही हटा दिए जाते हैं। यही कारण है कि नसबंदी के बाद कुत्तों की प्रजनन क्षमता पूरी तरह खत्म हो जाती है और उनका व्यवहार भी धीरे-धीरे बदल जाता है।
कुल मिलाकर, यह प्रक्रिया न केवल आवारा कुत्तों की संख्या को नियंत्रित करती है बल्कि उनके स्वास्थ्य और इंसानों की सुरक्षा दोनों के लिए आवश्यक है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद अब यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि नसबंदी और टीकाकरण का काम व्यवस्थित और समयबद्ध तरीके से किया जाए, ताकि समाज में इंसान और जानवरों के बीच संतुलन और सामंजस्य बना रहे।
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