रक्षाबंधन पर बना दुर्लभ संयोग!
रक्षाबंधन का पर्व इस बार 9 अगस्त, शनिवार को मनाया जाएगा, जो विशेष रूप से शुभ माना जा रहा है। इस दिन भद्रा का साया नहीं होगा और पूरे दिन राखी बांधने के लिए शुभ मुहूर्त रहेगा। पर्व के दिन आयुष्मान योग, सर्वार्थ सिद्धि योग, सौभाग्य योग और प्रीति योग जैसे कई दुर्लभ संयोग एक साथ बन रहे हैं। ग्रहों की स्थिति भी विशेष है—सूर्य, बुध, गुरु, शुक्र और चंद्रमा अपनी-अपनी राशियों में शुभ प्रभाव में होंगे। रक्षाबंधन पर लगभग 297 वर्षों बाद ऐसा शुभ योग बन रहा है, जिससे यह पर्व और भी अधिक पावन हो गया है।
पौराणिक मान्यता के अनुसार, रक्षाबंधन की शुरुआत देवी लक्ष्मी द्वारा की गई थी। कथा के अनुसार, एक बार राजा बलि ने भगवान विष्णु से वरदान मांगा कि वे उनके साथ पाताल लोक में निवास करें। भगवान विष्णु ने यह वरदान स्वीकार कर लिया, जिससे माता लक्ष्मी चिंतित हो गईं। नारद मुनि की सलाह पर माता लक्ष्मी व्रती रूप में राजा बलि के पास पहुंचीं और उन्हें राखी बांधी। जब राजा बलि ने उनका भाई बनकर उन्हें उपहार देने को कहा, तब लक्ष्मी जी ने भगवान विष्णु को अपने साथ ले जाने की प्रार्थना की। बलि ने बहन की बात मानकर उन्हें भगवान विष्णु लौटा दिए। तभी से राखी का यह पर्व भाई-बहन के प्रेम, त्याग और रक्षा का प्रतीक बन गया।
रक्षाबंधन पर सबसे पहले घर में भगवान गणेश और श्रीकृष्ण को राखी बांधने की परंपरा है। इसके बाद बहनें अपने भाइयों को राखी बांधती हैं। पूजा की थाली में राखी, कुमकुम, अक्षत, मिठाई, दीपक और इलायची रखें। भाई को एक साफ आसन पर बैठाकर पहले तिलक करें, फिर दाहिने हाथ की कलाई में राखी बांधें और मिठाई खिलाएं। इस दौरान “ॐ येन बद्धो बलि राजा…” मंत्र का जाप करना विशेष फलदायक माना जाता है। राखी बांधने के बाद भाई की हथेली में इलायची और अक्षत रखकर उन्हें लॉकर या तिजोरी में रखने की परंपरा भी है, जिससे सुख-समृद्धि बनी रहती है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, रक्षाबंधन पर बांधी गई राखी को कम से कम 21 दिनों तक या जन्माष्टमी तक नहीं उतारना चाहिए। यह शुभ संकेत माना जाता है और रक्षाबंधन की रक्षा भावना को लंबे समय तक जीवित रखने का प्रतीक है। कई विद्वानों का मानना है कि इस पर्व पर दिशा, मुहूर्त और विधि का विशेष ध्यान रखने से जीवन में सुख, शांति और समृद्धि आती है। भाई और बहन के रिश्ते को मजबूत बनाने के लिए यह दिन अत्यंत महत्वपूर्ण होता है।
रक्षाबंधन केवल भाई-बहन के प्रेम का उत्सव नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति में गुरु-शिष्य परंपरा और परिवारिक बंधनों की पवित्रता का भी प्रतीक है। इस दिन वेदपाठी ब्राह्मण श्रावणी उपाकर्म करते हैं और गुरुजनों को रक्षा सूत्र बांधते हैं। इससे यह पर्व केवल भावनात्मक नहीं, आध्यात्मिक रूप से भी अत्यंत महत्वपूर्ण बन जाता है। शास्त्रों में इसे श्रावणी पर्व कहा गया है, जो ज्ञान, आस्था और विश्वास का संगम है।
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