May 5, 2026

क्या शेयर बाजार में आने वाली है भारी तबाही? आंकड़े चौंकाने वाले, लेकिन तस्वीर इतनी भी काली नहीं

भारत के शेयर बाजार में इस समय बड़ा असंतुलन देखने को मिल रहा है, जहां एक तरफ प्रमोटर्स और इंसाइडर्स बड़े पैमाने पर अपनी हिस्सेदारी बेच रहे हैं, वहीं दूसरी ओर खुदरा निवेशक बाजार में जमकर पैसा लगा रहे हैं। आंकड़ों के अनुसार, केवल जून 2025 में प्रमोटर्स और इनसाइडर्स द्वारा 11 अरब डॉलर की बिकवाली की गई, जिससे इस कैलेंडर वर्ष की पहली छमाही में कुल निकासी 30 अरब डॉलर तक पहुंच गई। यह प्रवृत्ति निवेशकों के बीच चिंता का विषय बन रही है, क्योंकि प्रमोटर्स की बिकवाली को अक्सर कंपनी के भविष्य में विश्वास की कमी के रूप में देखा जाता है।

इन प्रमोटर्स में कई बड़ी कंपनियों के नाम शामिल हैं—जैसे मुकेश अंबानी और सुनील मित्तल जैसे दिग्गजों ने अपनी हिस्सेदारी बेची है। भारती एयरटेल, बजाज फाइनेंस, हिंदुस्तान जिंक, इंडिगो, वी-मार्ट और एशियन पेंट्स जैसी कंपनियों में प्रमोटर और पीई निवेशकों ने बड़ी निकासी की है। आईटीसी में बीएटी ने भी 1.5 अरब डॉलर की हिस्सेदारी बेच दी है। आईपीओ बाजार में भी यही रुझान देखने को मिला है—जहां नए शेयरों के ज़रिए जुटाई गई पूंजी की तुलना में ओएफएस से कहीं ज़्यादा हिस्सेदारी बेची गई है।

साथ ही, विदेशी निवेशकों (FPI) ने भी जून तक 11 अरब डॉलर की बिकवाली की है, जो बाजार के लिए और अधिक दबाव का संकेत देता है। इसके बावजूद, इस साल भारतीय शेयर बाजार करीब 7% ऊपर रहा है। इसका प्रमुख कारण है घरेलू निवेशकों की आक्रामक भागीदारी—उन्होंने अकेले 6 महीनों में 40 अरब डॉलर का निवेश किया है। खुदरा निवेशकों ने मंदी, भू-राजनीतिक तनाव और वैश्विक नीति संकट को नजरअंदाज कर म्यूचुअल फंडों और सीधे शेयर बाजार में निवेश जारी रखा है।

विशेषज्ञों के अनुसार, प्रमोटर्स की बिकवाली हमेशा संकट का संकेत नहीं होती। कई बार यह रणनीतिक निकासी, पूंजी के पुनर्निवेश, लोन चुकाने या नए उपक्रमों के लिए होती है। पीई फंड्स की भी एक निश्चित जीवन चक्र होती है, जिसके अंत में उन्हें निवेश बेचकर अपने निवेशकों को पैसा लौटाना पड़ता है। विशेषज्ञ मानते हैं कि इस समय जो बिकवाली हो रही है वह वैल्यूएशन के शिखर को देखते हुए लाभ बुकिंग और पोर्टफोलियो बैलेंसिंग का हिस्सा है।

कोटक इंस्टीट्यूशनल इक्विटीज और वेंचुरा जैसी संस्थाएं मानती हैं कि खुदरा निवेशकों को घबराने की जरूरत नहीं है। म्यूचुअल फंडों ने केवल जून महीने में ही करीब 28,000 करोड़ रुपये का निवेश किया, जिससे बाजार में बिकवाली के प्रभाव को संतुलन मिला। इसके अलावा, ब्लॉक डील्स के जरिए म्यूचुअल फंडों की खरीदारी प्रमोटर निकासी के लगभग बराबर रही है, जो घरेलू निवेशकों के आत्मविश्वास को दर्शाता है।

मेहता इक्विटीज़ और ओमनीसाइंस कैपिटल जैसे संस्थानों के विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया कि यह सब एक परिपक्व बाजार के संकेत हैं, जहां बड़े निवेशक अवसर देखकर समय-समय पर अपनी हिस्सेदारी समायोजित करते हैं। उनका मानना है कि भारत की अर्थव्यवस्था के बुनियादी संकेत अभी भी मजबूत हैं और बाजार की दीर्घकालिक संभावनाएं सकारात्मक बनी हुई हैं।

नतीजतन, रिटेल निवेशकों को सलाह दी गई है कि वे अपने एसआईपी जारी रखें, बाजार में गिरावट को अवसर के रूप में देखें और केवल भावनात्मक सुर्खियों पर प्रतिक्रिया देने से बचें। विशेषज्ञ कहते हैं कि अगर निवेश लॉन्ग टर्म विज़न के साथ किया गया है, तो ऐसी बिकवाली केवल अस्थायी उतार-चढ़ाव पैदा करती है, संकट नहीं।

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