भारत-अमेरिका ट्रेड डील पर 9 जुलाई से पहले मुहर की उम्मीद, कृषि और ऑटोमोबाइल सेक्टर बने रोड़ा
भारत और अमेरिका के बीच अंतरिम व्यापार समझौते को 9 जुलाई से पहले अंतिम रूप दिए जाने की संभावना जताई जा रही है। भारतीय वार्ताकारों की टीम, जिसका नेतृत्व वाणिज्य विभाग के विशेष सचिव राजेश अग्रवाल कर रहे हैं, हाल ही में वाशिंगटन से लौट चुकी है। हालांकि, कृषि और ऑटोमोबाइल सेक्टर से जुड़े कुछ मुद्दे अभी भी लंबित हैं, जिस पर आगे चर्चा की जाएगी।
क्या है पेंच?
भारत ने अमेरिका द्वारा लगाए गए 25% आयात शुल्क का मुद्दा उठाया है, जो खासकर यात्री वाहनों, हल्के ट्रकों और कुछ ऑटो पार्ट्स पर लागू है। भारत ने इस मामले को विश्व व्यापार संगठन (WTO) की सुरक्षा समिति में उठाया है और संकेत दिया है कि उसने स्टील और एल्यूमिनियम पर अमेरिकी टैरिफ के जवाब में कुछ अमेरिकी उत्पादों पर जवाबी शुल्क लगाने का अधिकार सुरक्षित रखा है।
दूसरी ओर, अमेरिका कृषि उत्पादों जैसे डेयरी, सेब, मेवे और जीएम फसलों पर शुल्क रियायत चाहता है, लेकिन यह क्षेत्र भारत के लिए राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील है। भारत ने अब तक किसी भी एफटीए (Free Trade Agreement) में अपने डेयरी सेक्टर को नहीं खोला है, और इस बार भी वह इसे लेकर सख्त रुख अपनाए हुए है।
अमेरिका के टैरिफ निलंबन की डेडलाइन
यह बातचीत इसलिए अहम है क्योंकि अमेरिका द्वारा भारतीय उत्पादों पर लगाए गए 26% अतिरिक्त शुल्क का अस्थायी निलंबन 9 जुलाई को खत्म हो रहा है। अगर इससे पहले समझौता नहीं होता, तो भारत को फिर से इन टैरिफ का सामना करना पड़ सकता है।
भारत की मांगें क्या हैं?
भारत चाहता है कि उसे अमेरिका की ओर से लगाए गए 26% अतिरिक्त शुल्क से पूरी छूट दी जाए। साथ ही वह अपने श्रम-प्रधान क्षेत्रों जैसे कपड़ा, रत्न-आभूषण, चमड़ा, परिधान, प्लास्टिक, रसायन, झींगा, तिलहन, अंगूर और केले के लिए टैरिफ रियायत चाहता है। वहीं, अमेरिका इंडस्ट्रियल उत्पादों, इलेक्ट्रिक वाहनों, वाइन और पेट्रोकेमिकल्स पर शुल्क में छूट की मांग कर रहा है।
क्या हो सकता है आगे?
अगर दोनों पक्षों के बीच गतिरोध खत्म हो जाता है, तो 9 जुलाई से पहले एक सीमित लेकिन महत्वपूर्ण व्यापार समझौते पर दस्तखत संभव हैं। यह डील दोनों देशों के बीच व्यापार संबंधों को एक नई दिशा दे सकती है, लेकिन कृषि और ऑटो जैसे संवेदनशील सेक्टरों पर सहमति बनाना फिलहाल सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है।
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