April 18, 2026

हिमाचल में बादल फटने से तबाही! मंडी में गाड़ियां बहीं..

हिमाचल प्रदेश में मॉनसून का कहर अब विकराल रूप लेता जा रहा है। जहां एक ओर मौसम विभाग लगातार भारी बारिश की चेतावनियां जारी कर रहा है, वहीं दूसरी ओर पहाड़ी जिलों में बादल फटने, भूस्खलन और बाढ़ जैसी आपदाएं जनजीवन को बुरी तरह प्रभावित कर रही हैं। ताजा मामला मंडी जिले के करसोग उपमंडल का है, जहां सोमवार देर रात पंजराट और मेगली गांवों में बादल फटने की घटना हुई। इस घटना में कई घर क्षतिग्रस्त हुए हैं, दर्जनों गाड़ियां बह गईं, और करसोग बाईपास सड़क का बड़ा हिस्सा टूटकर बह गया।

घटना के बाद स्थानीय लोग भय और अनिश्चितता के साए में जी रहे हैं। कई परिवार अपने घरों से बाहर खुले में रात गुजारने को मजबूर हैं। गांववालों ने प्रशासन से अपील की है कि राहत और बचाव कार्यों में तेजी लाई जाए। सूचना मिलते ही प्रशासनिक टीमें मौके पर रवाना हुईं, लेकिन पहाड़ी इलाकों में टूटी सड़कों और लगातार हो रही बारिश ने राहत पहुंचाने में बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है।

राज्य में बारिश का कहर केवल मंडी तक सीमित नहीं है। चंबा जिले में तीसा के पास भारी बारिश से एक पुल बह गया, जिससे सैकड़ों गांवों का संपर्क मुख्यालय से कट गया है। कुल्लू जिले में बंजार के पास पार्वती नदी उफान पर है और इसके किनारे बने घरों व दुकानों को खाली कराना पड़ा है। कई जगह खेतों में मलबा भर गया है, जिससे स्थानीय किसानों को भारी नुकसान हुआ है।

शिमला जिले में भी हालात चिंताजनक बने हुए हैं। कुफरी, ठियोग और मशोबरा जैसे इलाकों में लगातार हो रही मूसलाधार बारिश ने कई जगहों पर लैंडस्लाइड की स्थितियां पैदा कर दी हैं। ठियोग में NH-5 का एक बड़ा हिस्सा धंस गया है, जिससे ट्रैफिक पूरी तरह ठप हो गया है। शिमला शहर के लोअर बाजार और ढली क्षेत्रों में पानी घरों में घुस गया है और दुकानदारों को भारी नुकसान उठाना पड़ा है।

26 जून को भी राज्य में ऐसी ही त्रासदी देखने को मिली थी, जब कांगड़ा और कुल्लू जिलों में बादल फटे थे। मनुनी खड्ड क्षेत्र में जलस्तर बढ़ने के कारण श्रमिक कॉलोनी में 15-20 लोग बह गए थे। उस हादसे में अब तक 10 लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है जबकि कई अब भी लापता हैं।

इस पूरे आपदा चक्र ने हिमाचल के आपदा प्रबंधन की तैयारी और क्षमता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि राज्य को पहले से ही अलर्ट मिला था, फिर भी जोखिम वाले क्षेत्रों में लोगों को हटाने के प्रयास धीमे रहे। ग्रामीण इलाकों में न तो कोई सटीक चेतावनी प्रणाली है और न ही आपात राहत पहुंचाने की मजबूत व्यवस्था।

राज्य सरकार और जिला प्रशासन दावा कर रहे हैं कि वे स्थिति पर पूरी नजर बनाए हुए हैं और हरसंभव सहायता पहुंचाई जा रही है। लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयान करती है—लोग अपने घरों को खाली कर रहे हैं, सुरक्षित स्थानों पर शरण ले रहे हैं, और उनकी आंखों में डर साफ नजर आ रहा है।

विशेषज्ञों के अनुसार, हिमाचल की भौगोलिक बनावट इसे बारिश और भूस्खलन के लिए अत्यधिक संवेदनशील बनाती है। ऊपर से अनियोजित निर्माण, जंगलों की कटाई और प्राकृतिक जल निकासी मार्गों पर अतिक्रमण ने हालात को और बदतर बना दिया है।

अब केवल राहत और बचाव कार्य ही काफी नहीं है। राज्य और केंद्र सरकार को मिलकर एक स्थायी नीति बनानी होगी जिसमें जलवायु परिवर्तन के अनुकूल निर्माण, जल प्रबंधन, पुनर्वास और चेतावनी तंत्र को मजबूत करना प्राथमिकता हो।

मंडी, कांगड़ा, कुल्लू, चंबा और शिमला—ये पांच जिले इस समय राज्य के लिए चेतावनी की तरह हैं। अगर अभी नहीं चेते, तो आने वाले समय में हिमाचल में हर मानसून मौत का पैगाम बन जाएगा। पहाड़ों की यह पुकार अब अनसुनी नहीं की जानी चाहिए।

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