विदेश दौरे से पहले चर्चा में आई संसद की ऐतिहासिक कुर्सी, जिस पर लिखा है INDIA – जानिए इसका भारत से क्या है रिश्ता
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 8 दिन के महत्वपूर्ण विदेश दौरे पर बुधवार को रवाना होंगे। इस दौरान वे घाना, त्रिनिदाद एंड टोबैगो, अर्जेंटीना, ब्राजील और नामीबिया की यात्रा करेंगे। लेकिन इस दौरे से पहले त्रिनिदाद एंड टोबैगो की संसद में रखी एक ऐतिहासिक कुर्सी अचानक सुर्खियों में आ गई है — वो कुर्सी, जिस पर “INDIA” लिखा है और जो भारत-त्रिनिदाद संबंधों की एक जीवित मिसाल मानी जाती है।
इस दौरे में पीएम मोदी त्रिनिदाद एंड टोबैगो की संसद का दौरा भी करेंगे और यहीं मौजूद उस ऐतिहासिक स्पीकर चेयर के सामने भाषण देंगे, जो भारत ने 57 साल पहले इस देश को भेंट की थी। यह कुर्सी अब दोनों देशों के लोकतांत्रिक और ऐतिहासिक रिश्तों की प्रतीक बन चुकी है।
साल 1968 में भारत सरकार ने ब्रिटिश शासन से हाल ही में स्वतंत्र हुए त्रिनिदाद एंड टोबैगो को संसद के लिए यह विशेष कुर्सी गिफ्ट की थी। यह वही समय था जब भारत की विदेश नीति अपने प्रभाव को वैश्विक स्तर पर मजबूत कर रही थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के निर्देश पर यह कुर्सी 9 फरवरी 1968 को वहां की संसद में भारतीय उच्चायुक्त मुनि लाल ने सौंपी थी।
त्रिनिदाद की संसद में इस कार्यक्रम की बकायदा रिकॉर्डिंग भी है, जिसमें यह उल्लेख किया गया कि कैसे दोपहर 1.37 बजे संसद की कार्यवाही में इस उपहार का एलान हुआ और 1.45 बजे कुर्सी को सौंपा गया। इसके बाद उपस्थित सांसदों ने करतल ध्वनि से इस उपहार का स्वागत किया।
इस कुर्सी की विशेषता सिर्फ इसका भेंट स्वरूप नहीं है, बल्कि इसकी बनावट और प्रतीकात्मक महत्व भी है। भारतीय शैली में बनी यह लकड़ी की कुर्सी महीनों तक तैयार की गई थी। इसमें की गई नक्काशी और शिल्प कौशल भारत की कारीगरी का उत्कृष्ट उदाहरण है। इसे तैयार करने में देरी भी हुई क्योंकि एक कारीगर की तबीयत खराब हो गई थी, जिससे यह भेंट छह साल बाद संभव हो सकी।
त्रिनिदाद एंड टोबैगो के साथ भारत का रिश्ता केवल कूटनीति तक सीमित नहीं है। यहां की आबादी में करीब 42 फीसदी लोग भारतीय मूल के हैं, जिनके पूर्वज 19वीं सदी में गिरमिटिया प्रणाली के तहत यहां पहुंचे थे। आज भारतीय मूल के लोग इस देश में सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।
इस ऐतिहासिक कुर्सी के माध्यम से भारत और त्रिनिदाद एंड टोबैगो के रिश्तों की गहराई एक बार फिर चर्चा में है। प्रधानमंत्री मोदी की इस यात्रा को इन पुराने संबंधों की नई मजबूती के तौर पर देखा जा रहा है, जहां संसद की यह कुर्सी बीते 57 वर्षों की साझी विरासत को आज भी जीवंत रूप से दर्शा रही है।
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