भद्रा काल में हुई शादी ने उजाड़ दिया घर, पुराणों में दर्ज है डरावनी चेतावनी

कई बार वर-वधु की कुंडली पूरी तरह से मेल खा जाती है, नाड़ी दोष या मांगलिक दोष भी नहीं होते, फिर भी वैवाहिक जीवन अशांत और दुखदायी बन जाता है। इसके पीछे अक्सर एक बड़ा कारण अनदेखा रह जाता है—विवाह का भद्रा काल में होना।

हिंदू पंचांग में ‘भद्रा’, जिसे विष्टि करण भी कहा जाता है, को अशुभ समय माना गया है। इस दौरान कोई भी शुभ कार्य—विशेषकर विवाह, यात्रा या गृह प्रवेश—नहीं करना चाहिए। पुराणों में साफ तौर पर उल्लेख है कि भद्राकाल में किए गए मांगलिक कार्यों के परिणाम प्रतिकूल होते हैं।

भद्रा को सूर्य की पुत्री और शनि की बहन माना गया है, और उसका स्वभाव उग्र बताया गया है। इस काल में की गई शादियों से वैवाहिक जीवन में क्लेश, बीमारी, आर्थिक तंगी और संतानहीनता जैसे संकट उत्पन्न हो सकते हैं।

इतिहास और परंपरा में ऐसे कई उदाहरण हैं जहां भद्रा काल में हुई शादियां टूट गईं या उनका अंत दुखद हुआ। इसलिए विवाह जैसे पवित्र संस्कार के लिए मुहूर्त निकालते समय इस बात का विशेष ध्यान रखना जरूरी होता है कि वह भद्रा काल में न पड़े।

भविष्य में वैवाहिक जीवन को सुखद और स्थिर बनाने के लिए जरूरी है कि विवाह से पहले केवल गुण-मिलान ही नहीं, बल्कि शुभ मुहूर्त और समय का भी ध्यान रखा जाए। गलत समय में किया गया यह फैसला जीवनभर की परेशानियों का कारण बन सकता है।

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