May 1, 2026

नहर में गिरी नहीं थी… उसे जबरदस्ती फेंका गया था” — पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने खोला अंकिता हत्याकांड का काला सच

उत्तराखंड के बहुचर्चित अंकिता भंडारी हत्याकांड में आख़िरकार वो राज़ सामने आ गया, जिसने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था। 18 सितंबर 2022 की वह शाम जब अंकिता अचानक लापता हो गई, और कुछ ही दिनों बाद उसका शव 25 सितंबर को चीला नहर से बरामद हुआ—वह बस एक हादसा नहीं था। यह एक सोची-समझी निर्मम हत्या थी, जिसे हादसे का रूप देने की कोशिश की गई, मगर एम्स ऋषिकेश के डॉक्टरों और फॉरेंसिक विशेषज्ञों की वैज्ञानिक पड़ताल ने उस झूठ पर से परदा हटा दिया।

शुरुआत में, इस केस को दबाने और दिशा भटकाने की तमाम कोशिशें हुईं। रिजॉर्ट के सीसीटीवी खराब मिले, गवाहों का अभाव रहा और कुछ कर्मचारियों ने पुलिस को गुमराह करने की कोशिश भी की। लेकिन जब मृतका का पोस्टमार्टम हुआ, तो कई अहम सवालों के जवाब मिलने लगे। रिपोर्ट में यह स्पष्ट था कि अंकिता किसी दुर्घटना की वजह से नहर में नहीं गिरी थी, उसे एक झटके में जबरदस्ती पानी में फेंका गया था।

फॉरेंसिक जांच में जिस थ्योरी का ज़िक्र हुआ—”सडन एस्कलरेशन ऑफ बॉडी”, वह यह बताती है कि किसी व्यक्ति को अचानक बलपूर्वक जलधारा में धकेला जाए तो शरीर पर किस प्रकार की चोटें होती हैं। विशेषज्ञों ने न केवल इस थ्योरी को क्राइम सीन विजिट के दौरान दोहराया, बल्कि कोर्ट के सामने ठोस वैज्ञानिक प्रमाण भी रखे, जो यह साबित करते थे कि यह कोई दुर्घटना नहीं थी। बचाव पक्ष ने इसे एक एक्सीडेंट साबित करने की कोशिश की, लेकिन रिपोर्ट्स और साक्ष्यों की श्रृंखला के सामने उनके तर्क टिक नहीं सके।

अदालत में अभियोजन पक्ष ने 1991 के जाहर लाल बनाम ओडिशा राज्य के फैसले का हवाला देते हुए यह स्पष्ट किया कि यदि साक्ष्य की श्रृंखला अभियुक्त की निर्दोषता की संभावना को पूरी तरह ख़ारिज करती है, तो मामला हत्या (क्रिमिनल होमिसाइड) का ही बनता है। कोर्ट ने इन सभी पहलुओं पर गंभीरता से विचार करते हुए माना कि अंकिता की मौत एक सोची-समझी हत्या थी।

अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश (एडीजे) की अदालत ने शुक्रवार को अपना फैसला सुनाते हुए तीनों हत्यारोपियों को आईपीसी की धारा 302 के तहत कठोरतम आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई। यह फैसला केवल एक न्यायिक प्रक्रिया की परिणति नहीं, बल्कि उन तमाम कोशिशों का परिणाम है जो सच्चाई को सामने लाने में जुटे रहे—चाहे वह पुलिस हो, डॉक्टर, या फॉरेंसिक टीम।

अंकिता के शरीर पर पाए गए चोटों के निशान, घटनास्थल का पुनर्निर्माण, और तकनीकी विश्लेषण ने मिलकर अदालत के सामने वो सच्चाई पेश की, जो पूरे देश को जाननी चाहिए थी—अंकिता नहर में गिरी नहीं थी, उसे फेंका गया था।

यह फैसला न केवल अंकिता के परिवार के लिए न्याय की एक बड़ी उपलब्धि है, बल्कि उन सभी बेटियों के लिए एक संदेश है कि देर भले हो, लेकिन सच्चाई कभी छुपती नहीं।

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