जय संतोषी मां: री-रिलीज क्यों जरूरी थी – और इसे नज़रअंदाज़ करना क्यों एक चूक है
‘जय संतोषी मां’ सिर्फ एक फिल्म नहीं थी, ये एक सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक आंदोलन बन गई थी। 1975 में जब यह फिल्म आई, उस समय ‘शोले’ और ‘दीवार’ जैसी महाविजेता फिल्मों का दौर था, लेकिन सीमित बजट और बिना बड़े सितारों वाली यह फिल्म न केवल हाउसफुल रही, बल्कि उसने भारतीय सिनेमा के मानकों को हिला दिया।
तो सवाल ये है – क्यों नहीं होनी चाहिए थी री-रिलीज?
जवाब साफ है: होनी ही चाहिए थी। और अब तक हो जानी चाहिए थी।
जनता की फिल्म, जनता की श्रद्धा
यह फिल्म महिलाओं के लिए पहली पैन इंडिया फिल्म बनकर उभरी। पुरुष प्रधान सिनेमा उद्योग में यह पहला उदाहरण था, जहां महिलाएं अकेले सिनेमा हॉल जाना शुरू कीं, व्रत-पूजा करने लगीं और फिल्म के गीत-कथाएं उनकी दिनचर्या का हिस्सा बन गईं। री-रिलीज करके उस ऐतिहासिक भावना को नई पीढ़ी से जोड़ना जरूरी था।
जब फिल्म ने देवी को जनदेवी बनाया
फिल्म के आने से पहले संतोषी माता का नाम शायद ही कोई जानता था, लेकिन इसके बाद देश भर में हर शुक्रवार व्रत, कथा और भक्ति गीतों का चलन शुरू हो गया। आज भी हर छोटे शहर के मंदिरों में संतोषी माता की मूर्ति देखी जा सकती है – ये फिल्म की शक्ति थी।
री-रिलीज का कोई न्यायसंगत मापदंड नहीं
आज ‘दीवार’, ‘कहो न प्यार है’, ‘जंजीर’ और ‘गाइड’ जैसी फिल्मों को दोबारा रिलीज किया गया, लेकिन ‘जय संतोषी मां’ को क्यों छोड़ा गया? क्या सिर्फ इसलिए कि फिल्म के निर्माता और कलाकार अब जीवित नहीं? क्या फिल्म का ऐतिहासिक प्रभाव, श्रद्धा और कमाई का रिकॉर्ड काफी नहीं है?
सिनेमा हॉल को भरने की क्षमता अभी भी है
आज जब थिएटर खाली हैं और फिल्में फ्लॉप हो रही हैं, ऐसे में ‘जय संतोषी मां’ जैसी भावनात्मक और भक्तिभाव से जुड़ी फिल्में थिएटर में लोगों को खींच सकती हैं। खासकर धार्मिक पर्वों के दौरान या महिला दर्शकों को लक्षित करके इसका इवेंट रिलीज किया जाए, तो इसका आर्थिक लाभ भी मिल सकता है।
यह सिर्फ फिल्म नहीं, एक विरासत है
इस फिल्म ने साबित किया कि लो बजट, साधारण स्टारकास्ट और सीमित संसाधनों में भी कोई फिल्म जनता के दिल में जगह बना सकती है। यह आज की उस मानसिकता के लिए जवाब है जो मानती है कि बड़े बजट और बड़े नाम जरूरी हैं।
निष्कर्ष: यह चूक क्यों गिनती जाएगी
‘जय संतोषी मां’ को री-रिलीज न करने का मतलब है – हमने सिनेमा के इतिहास के सबसे गहरे जनसंपर्क और सांस्कृतिक प्रभाव वाले अध्याय को नजरअंदाज कर दिया। यह एक ऐसी फिल्म थी जिसने विरासत, आस्था और व्यावसायिक सफलता तीनों को एक साथ बांध दिया था। अगर इस फिल्म की री-रिलीज होती, तो यह सिर्फ एक फिल्म देखना नहीं होता, बल्कि इतिहास से साक्षात्कार होता।
यह री-रिलीज नहीं, तो कम से कम एक भव्य श्रद्धांजलि जरूर डिज़र्व करती है।
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