April 25, 2026

“मां की ममता छूने से पहले छिन गई गोद, पिता सरहद पर तैनात – ओडिशा से आई एक दिल को झकझोर देने वाली कहानी”

सिर्फ 15 दिन की बच्ची… मां की ममता का एहसास भी ठीक से नहीं हो पाया और जीवन की पहली मुस्कान को दर्ज करने से पहले ही मौत की चुप्पी उसकी किस्मत में उतर आई। ये कोई फिल्मी कहानी नहीं, बल्कि ओडिशा के संबलपुर ज़िले से सामने आई एक असली, बेहद भावुक और हृदयविदारक सच्चाई है – जहां एक जवान की पत्नी ने दम तोड़ दिया, उस वक़्त जवान देश की सीमाओं पर तैनात था, ड्यूटी पर।

शुरुआत खुशियों से हुई थी, मगर अंजाम बेहद दर्दनाक

यह सब कुछ शुरू हुआ 28 अप्रैल को, जब झारसुगुड़ा ज़िले के लखनपुर ब्लॉक के टेंगनामाल गांव की लिपि गंड ने एक स्वस्थ बच्ची को जन्म दिया। पति देबराज गंड, जो सशस्त्र सीमा बल (SSB) में कार्यरत हैं, उस समय पत्नी के पास थे। घर में हँसी-खुशी का माहौल था, रिश्तेदारों के चेहरे खिल उठे थे, लेकिन यह मुस्कान ज्यादा देर टिक न सकी।

बच्ची के जन्म के कुछ ही घंटे बाद लिपि की तबीयत अचानक बिगड़ने लगी। स्थिति गंभीर होती देख, उन्हें संबलपुर के बुर्ला मेडिकल कॉलेज रेफर किया गया, जहां उन्हें आईसीयू में भर्ती किया गया। रिपोर्ट्स के मुताबिक, लिपि लगातार बेहोश रहीं, और धीरे-धीरे उनके शरीर के कई अंगों ने काम करना बंद कर दिया।

देश सेवा का बुलावा – और दिल पर पत्थर रखकर जाना पड़ा

इसी बीच, 11 मई को देबराज को बॉर्डर ड्यूटी पर वापस लौटने का आदेश मिला। पत्नी की नाजुक हालत और नवजात बच्ची की ज़िम्मेदारी के बावजूद, देश के प्रति अपने कर्तव्य को सबसे ऊपर रखते हुए देबराज ने आंखों में आंसू और मन में भारीपन लिए अपने गांव और परिवार को पीछे छोड़ दिया।

जिस वक्त वह सरहद पर पहुंचे, उस समय उनकी पत्नी जिंदगी और मौत के बीच झूल रही थी, और नवजात बच्ची अस्पताल के एक कोने में मां की ऊंगलियां थामने का इंतज़ार कर रही थी – जो कभी पूरा नहीं हो सका।

13 मई की सुबह – जब उम्मीद भी दम तोड़ गई

आज, 13 मई को, इलाज के दौरान लिपि का निधन हो गया। डॉक्टरों ने पुष्टि की कि उनकी मौत मल्टी ऑर्गन फेल्योर की वजह से हुई। देबराज को अब भी इस बात की जानकारी ड्यूटी के बीच मिली। यह खबर सिर्फ उनके लिए ही नहीं, बल्कि पूरे गांव के लिए भी वज्रपात से कम नहीं थी।

गांव में मातम छाया हुआ है। लोग लिपि के निधन पर शोक में डूबे हैं। जिन हाथों में कंगन की खनक थी, वहां अब केवल चुप्पी है। जिन आंखों में मां बनने का सपना पलता था, वो हमेशा के लिए बंद हो चुकी हैं।

एक मासूम – जिसके हिस्से में मां नहीं आई

अब एक तरफ वो नवजात बच्ची है, जिसने अभी अपनी मां की आवाज़ भी नहीं सुनी, चेहरा भी नहीं पहचाना, और दूसरी ओर उसका पिता है – देश की रक्षा में सीमा पर तैनात, जिसकी आंखें शायद ही अब कभी सूख सकें।

ये कहानी सिर्फ एक परिवार की नहीं, बल्कि हर उस जवान की है, जो देश के लिए अपनी निजी ज़िंदगी की सबसे बड़ी खुशियों और दर्द को छोड़ देता है। और ये सवाल छोड़ जाती है – क्या देशभक्ति का मूल्य इतना बड़ा है कि एक सैनिक को अपनी अर्धमूर्छित पत्नी और नवजात बच्ची को भी पीछे छोड़ना पड़े?

यह कहानी उस शौर्य की भी है… और उस त्याग की भी, जो खामोशी से सिर्फ सहता है, लेकिन कहता कुछ नहीं।

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