April 17, 2026

भारत-पाकिस्तान तनाव के बीच अमेरिकी कूटनीति सक्रिय: विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने जयशंकर, डार और पाक आर्मी चीफ को किया फोन, तनाव कम करने की अपील

दक्षिण एशिया की सरहदों पर जब युद्ध जैसे हालात मंडरा रहे हैं, तब दुनिया की सबसे बड़ी ताकत अमेरिका ने कूटनीतिक मोर्चा संभाल लिया है। भारत और पाकिस्तान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव को देखते हुए अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने दोनों देशों के शीर्ष नेताओं से सीधे संवाद किया है। इस घटनाक्रम ने वैश्विक मंच पर स्थिति की गंभीरता को रेखांकित कर दिया है।

अमेरिकी विदेश विभाग की ओर से जारी बयान में बताया गया कि विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने शनिवार को भारतीय विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर से टेलीफोन पर बातचीत की। इस बातचीत में रुबियो ने ज़ोर देकर कहा कि दोनों देशों को तत्काल तनाव कम करने और गलतफहमियों से बचने के लिए सीधे संवाद की प्रक्रिया को फिर से शुरू करने के तरीके तलाशने चाहिए। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि अमेरिका इस कठिन समय में रचनात्मक बातचीत को आगे बढ़ाने में मदद करने को तैयार है, जिससे भविष्य में होने वाले संभावित संघर्षों को रोका जा सके।

अमेरिकी प्रयास यहीं तक सीमित नहीं रहे। रुबियो ने पाकिस्तान के विदेश मंत्री इशाक डार से भी बात की और वही संदेश दोहराया। उन्होंने कहा कि मौजूदा स्थिति को नियंत्रण में लाना और संवाद की खिड़की को खुला रखना ही दोनों देशों के हित में है। उन्होंने पाकिस्तान से भी आग्रह किया कि वह गलत अनुमान और अति-प्रतिक्रिया से बचते हुए रचनात्मक वार्ता की दिशा में आगे बढ़े।

इसके अलावा, अमेरिकी विदेश मंत्री ने पाकिस्तान के शक्तिशाली सेना प्रमुख जनरल आसिफ मुनीर को भी फोन कर मौजूदा हालात पर चर्चा की। उन्होंने पाकिस्तान की सैन्य लीडरशिप से आग्रह किया कि वे तनाव कम करने और क्षेत्रीय शांति बनाए रखने में सक्रिय भूमिका निभाएं। रुबियो ने यह भी दोहराया कि अमेरिका किसी भी प्रकार की सकारात्मक पहल में मध्यस्थता और समर्थन देने को तैयार है।

इस तरह, अमेरिका ने स्पष्ट संकेत दे दिया है कि वह भारत-पाक संघर्ष को सिर्फ एक क्षेत्रीय मसला नहीं मानता, बल्कि इसे वैश्विक स्थिरता के लिए चुनौती के रूप में देख रहा है। अमेरिकी विदेश मंत्री की लगातार तीन उच्च स्तरीय बातचीत इस ओर इशारा करती है कि आने वाले दिन कूटनीतिक गतिविधियों से और अधिक गरमाएंगे। लेकिन बड़ा सवाल अब भी यही है—क्या कूटनीति जंग की आंच को रोक पाएगी?

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