April 25, 2026

मिलान में सीतारमण की बड़ी कूटनीतिक बैठकों की गूंज, लेकिन पाकिस्तान पर रही चुप्पी!

भारत की वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने एशियन डेवलपमेंट बैंक (ADB) की 58वीं वार्षिक बैठक के अवसर पर मिलान (इटली) में दो अहम मुलाकातें कीं—पहली ADB के अध्यक्ष मसातो कांडा से और दूसरी इटली के वित्त मंत्री जिआनकार्लो जॉर्जेटी से। इन बैठकों में वैश्विक और क्षेत्रीय आर्थिक मुद्दों पर व्यापक चर्चा हुई, लेकिन आश्चर्यजनक रूप से भारत-पाकिस्तान तनाव जैसे किसी भी भूराजनीतिक विषय का कोई जिक्र नहीं हुआ। वित्त मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि इन द्विपक्षीय चर्चाओं में पाकिस्तान से संबंधित कोई भी मुद्दा एजेंडे में नहीं था।

वित्त मंत्रालय ने जानकारी दी कि ADB अध्यक्ष के साथ हुई बातचीत में सीतारमण ने दोहराया कि भारत अब प्राइवेट सेक्टर के नेतृत्व वाले आर्थिक विकास मॉडल पर ज़ोर दे रहा है। उन्होंने बताया कि भारत सरकार दिवाला एवं ऋणशोधन अक्षमता संहिता, जीएसटी के सफल कार्यान्वयन, और उत्पादन से जुड़े प्रोत्साहन (PLI) जैसी नीतियों के माध्यम से एक सक्षम और निवेश-अनुकूल वातावरण तैयार कर रही है। उन्होंने यह भी कहा कि भारत नवोन्मेषी वित्तीय उत्पादों और मॉडल्स को अपनाने और संचालित करने के लिए एडीबी को नए अवसर प्रदान कर रहा है।

ADB अध्यक्ष मसातो कांडा ने भारत की आर्थिक नीतियों की सराहना करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘विकसित भारत 2047’ विजन को पूर्ण समर्थन देने की बात कही। उन्होंने ADB की तरफ से भारत की विकास प्राथमिकताओं में सहयोग जारी रखने का भरोसा दिलाया।

इसके बाद सीतारमण की इटली के वित्त मंत्री जिआनकार्लो जॉर्जेटी के साथ बैठक भी काफी महत्वपूर्ण रही। दोनों नेताओं ने भारत-इटली के आर्थिक संबंधों को और मजबूत करने और वैश्विक एवं बहुपक्षीय मंचों पर आपसी सहयोग को बढ़ाने के विषयों पर चर्चा की। खासतौर पर उन्होंने संयुक्त रणनीतिक कार्य योजना 2025-2029 के कार्यान्वयन पर भी प्रकाश डाला, जिसे भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और इटली की प्रधानमंत्री जियोर्जिया मेलोनी ने नवंबर 2024 में घोषित किया था। यह कार्य योजना प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में गहराई और गति के साथ सहयोग को बढ़ावा देने की दिशा में एक मजबूत पहल मानी जा रही है।

इन बैठकों से यह स्पष्ट हो गया कि भारत वैश्विक आर्थिक रणनीतियों में निर्णायक भूमिका निभा रहा है, लेकिन पाकिस्तान जैसे संवेदनशील मुद्दों पर रणनीतिक चुप्पी बनाए रखना कूटनीति का हिस्सा है या कोई संकेत—यह आने वाले दिनों में स्पष्ट होगा।

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