April 24, 2026

आखिर क्यों कार्यकाल खत्म होने से पहले ही IMF से वापस बुला लिए गए कृष्णमूर्ति सुब्रमण्यन? परदे के पीछे की कहानी में छिपे हैं कई संकेत

एक महत्वपूर्ण बैठक से ठीक पहले, अचानक भारत सरकार ने एक ऐसा फैसला लिया जिसने अंतरराष्ट्रीय आर्थिक हलकों में हलचल मचा दी। भारत के वरिष्ठ अर्थशास्त्री और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) में कार्यकारी निदेशक (ED) के रूप में सेवा दे रहे कृष्णमूर्ति वी सुब्रमण्यन को कार्यकाल खत्म होने से छह महीने पहले ही वापस बुला लिया गया। यह फैसला ऐसे समय पर आया है जब 9 मई को IMF की एक अहम बैठक होने वाली थी, जिसमें पाकिस्तान को दी जाने वाली अतिरिक्त वित्तीय सहायता पर निर्णय होना था। सुब्रमण्यन की इस अप्रत्याशित विदाई ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं, क्योंकि सरकार ने उन्हें समय से पहले बुलाने का कोई आधिकारिक कारण नहीं बताया।

कृष्णमूर्ति सुब्रमण्यन को अगस्त 2022 में IMF में भारत के कार्यकारी निदेशक के पद पर नियुक्त किया गया था और उन्होंने 1 नवंबर 2022 से अपना कार्यभार संभाला था। इस भूमिका में वे भारत के साथ-साथ बांग्लादेश, श्रीलंका और भूटान का भी प्रतिनिधित्व कर रहे थे। इससे पहले वह 2018 से 2021 तक भारत सरकार में मुख्य आर्थिक सलाहकार के पद पर भी कार्य कर चुके हैं। उनके अनुभव और विशेषज्ञता को देखते हुए यह तय माना जा रहा था कि वे अपना तीन साल का कार्यकाल पूरा करेंगे, लेकिन अचानक बीच में ही वापसी के आदेश ने सबको चौंका दिया।

अब तक सरकार की ओर से कोई आधिकारिक वजह नहीं बताई गई है, लेकिन सूत्रों और मीडिया रिपोर्ट्स में इस फैसले के पीछे दो संभावित कारणों की चर्चा हो रही है। पहला, सुब्रमण्यन द्वारा IMF के डेटा सेट्स की गुणवत्ता और उनकी विश्वसनीयता को लेकर जताई गई चिंता। कहा जा रहा है कि उन्होंने IMF के कुछ आर्थिक आंकड़ों को लेकर गंभीर सवाल उठाए थे, जो वाशिंगटन स्थित इस बहुपक्षीय संस्था के अधिकारियों को नागवार गुजरे। माना जा रहा है कि इससे दोनों पक्षों के बीच तनाव उत्पन्न हुआ।

दूसरी बड़ी वजह उनकी हाल ही में प्रकाशित किताब “India @ 100” को माना जा रहा है। इस पुस्तक के प्रचार-प्रसार को IMF के कुछ अधिकारियों ने संभावित ‘हितों के टकराव’ (conflict of interest) के रूप में देखा, विशेषकर जब वे एक अंतरराष्ट्रीय संस्था में भारत का प्रतिनिधित्व कर रहे थे। इन दोनों घटनाओं को जोड़कर देखा जाए तो यह स्पष्ट संकेत मिलता है कि सुब्रमण्यन की स्वतंत्र और मुखर राय शायद IMF जैसी संस्था के आंतरिक संतुलन में असहजता पैदा कर रही थी।

हालांकि, इन सबके बावजूद जब तक सरकार की ओर से कोई आधिकारिक बयान नहीं आता, तब तक यह सब केवल कयास ही माने जाएंगे। लेकिन एक बात साफ है—IMF जैसी संस्था में भारत की ओर से प्रतिनिधित्व कर रहे एक वरिष्ठ और अनुभवी अधिकारी की अचानक विदाई किसी साधारण प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा नहीं हो सकती। इसके पीछे की असली वजह शायद वही है जो पर्दे के पीछे धीरे-धीरे सामने आ रही है—मतभेद, स्पष्टवादिता और संस्थागत असहजता का एक जटिल मेल।

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