‘मिनी स्विट्ज़रलैंड’ में खून का साया: पहलगाम के बायसरन में आतंकी कहर
बर्फ से ढकी चोटियों, घने देवदार के जंगलों और शांत वातावरण के लिए पहचानी जाने वाली बायसरन घाटी, जो दक्षिण कश्मीर के पहलगाम में स्थित है, मंगलवार दोपहर अचानक गोलियों की गूंज से दहल उठी। सेना की वर्दी पहने आतंकियों ने घने जंगलों से निकलकर घाटी में मौजूद पर्यटकों पर हमला बोल दिया। यह वही जगह है जिसे ‘मिनी स्विट्ज़रलैंड’ कहा जाता है, जहां लोग शांति, प्रकृति और सुंदरता की तलाश में आते हैं। लेकिन इस बार यह इलाका डर और चीखों का मंजर बन गया।
घटना दोपहर तीन बजे के आसपास की है, जब पर्यटक पिकनिक मना रहे थे, कोई घोड़ों की सवारी कर रहा था और कुछ खानपान स्टॉल पर बैठकर भोजन कर रहे थे। तभी आतंकी पहुंचे और परिचय पत्र दिखाने को कहा। चश्मदीदों के मुताबिक, उन्होंने पर्यटकों की धार्मिक पहचान जानने के बाद हिंदू यात्रियों पर गोलियां चलानी शुरू कर दीं। इस बर्बर हमले में कई भारतीयों समेत कुछ विदेशी सैलानियों की मौत हो गई। कुछ लोग पेड़ों और चट्टानों के पीछे छिपकर जान बचाने में सफल रहे, वहीं स्थानीय दुकानदारों और गाइडों ने बहादुरी दिखाते हुए कई घायलों को बचाया।
हमले की जिम्मेदारी द रेजिस्टेंस फ्रंट (TRF) नामक आतंकी संगठन ने ली है, जो लश्कर-ए-तैयबा से जुड़ा हुआ है और पाकिस्तान में बैठा सज्जाद गुल इसका संचालन कर रहा है। आतंकियों के आने का रास्ता किश्तवाड़ से कोकरनाग होते हुए बताया जा रहा है। उनकी संख्या पांच के आसपास बताई गई है। हमला करने के बाद वे पहाड़ियों की ओर भाग निकले और अब तक सुरक्षा बलों को कोई ठोस सुराग नहीं मिल सका है।
घटना की गंभीरता को देखते हुए राहत कार्य तुरंत शुरू किए गए। हेलीकॉप्टर के जरिए घायलों को निकालने की कोशिश हुई, लेकिन इलाके में सड़क मार्ग न होने के कारण यह कार्य चुनौतीपूर्ण रहा। स्थानीय लोग, टूरिस्ट गाइड और खच्चर संचालकों ने मिलकर कंधों पर घायलों को उठाकर मुख्य सड़क तक पहुंचाया। यह मानवीय प्रयास आतंक की भयावहता के बीच एक उम्मीद की किरण की तरह था।
इस हमले का समय भी विशेष रूप से संवेदनशील था। एक ओर भारत में अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस की मौजूदगी, दूसरी ओर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का सऊदी अरब दौरा और आने वाली अमरनाथ यात्रा की तैयारियां—इन सबके बीच यह हमला हुआ। यह वही इलाका है, जहां से 15 किलोमीटर की दूरी पर अमरनाथ यात्रा का बेस कैंप स्थित है। इससे पहले भी साल 2000 में अमरनाथ यात्रा पर बड़ा हमला हो चुका है, और 2019 में पुलवामा में सीआरपीएफ के काफिले पर भी फिदायीन हमला हुआ था।
हमले के बाद देशभर में राजनीतिक प्रतिक्रियाएं सामने आईं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने घटना की कड़ी निंदा की और कहा कि दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा। उन्होंने गृह मंत्री अमित शाह से बातचीत की और उन्हें तत्काल जम्मू-कश्मीर का दौरा करने को कहा। अमित शाह ने भी इस हमले को कायराना बताया और साजिशकर्ताओं के खिलाफ कड़ी कार्रवाई का भरोसा दिया। विपक्ष की ओर से कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने सरकार से जवाबदेही की मांग की और कहा कि अब खोखले दावों की बजाय ठोस कदम उठाने की जरूरत है। पीडीपी नेता इल्तिजा मुफ्ती ने भी हमले की निष्पक्ष जांच और सुरक्षा एजेंसियों की भूमिका की समीक्षा की मांग की।
इस हमले ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या कश्मीर में हालात वाकई सामान्य हो चुके हैं? क्या अमरनाथ यात्रा से पहले सुरक्षा व्यवस्था पूरी तरह दुरुस्त हो पाएगी? और क्या पर्यटक फिर से उसी निश्चिंतता के साथ घाटी में लौट सकेंगे? बायसरन घाटी की उस दोपहर ने सिर्फ खून ही नहीं बहाया, उसने पूरे देश को याद दिलाया कि आतंक की परछाइयाँ अभी भी हमारे बीच मौजूद हैं—और हमें अब भी सतर्क रहना है।
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