राष्ट्रपति और राज्यपाल के लिए समयसीमा तय करने वाले सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर समीक्षा याचिका दायर कर सकती है केंद्र सरकार
केंद्र सरकार सुप्रीम कोर्ट के उस हालिया फैसले को चुनौती देने पर विचार कर रही है, जिसमें राज्य विधानसभाओं द्वारा पारित विधेयकों पर राष्ट्रपति और राज्यपालों के फैसले के लिए समयसीमा निर्धारित की गई है। अधिकारियों के अनुसार, सरकार इस फैसले को लेकर समीक्षा याचिका दाखिल कर सकती है, क्योंकि इसमें कुछ ऐसे बिंदु शामिल हैं जो कार्यपालिका के अधिकार क्षेत्र को प्रभावित कर सकते हैं। हालांकि, इस पर अभी अंतिम निर्णय नहीं लिया गया है।
सरकार न केवल समयसीमा को लेकर समीक्षा की संभावना पर विचार कर रही है, बल्कि इस पहलू पर भी पुनर्विचार की मांग कर सकती है कि यदि राष्ट्रपति द्वारा किसी विधेयक को स्वीकृति नहीं दी जाती है तो राज्य सरकार सीधे सुप्रीम कोर्ट जा सकती है। एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न बताने की शर्त पर कहा कि समीक्षा याचिका दायर करने का विचार चल रहा है, लेकिन अभी इसकी समयसीमा तय नहीं की गई है। एक अन्य अधिकारी ने बताया कि याचिका के आधारों पर भी मंथन किया जाना बाकी है।
गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि राज्यपालों को राज्य विधानसभाओं द्वारा पारित विधेयकों पर एक महीने के भीतर निर्णय लेना होगा। वहीं, अगर कोई विधेयक राष्ट्रपति के पास विचार के लिए भेजा गया है तो राष्ट्रपति को तीन महीने की अवधि के भीतर निर्णय लेना अनिवार्य होगा। यह अवधि उस दिन से गिनी जाएगी जिस दिन विधेयक उनके पास भेजा गया हो। फैसले में यह भी कहा गया है कि यदि देरी होती है, तो उसके लिए उचित कारण दर्ज करना होगा और संबंधित राज्य को इसकी जानकारी देनी होगी।
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद तमिलनाडु सरकार ने ऐसे 10 विधेयकों को अधिसूचित कर दिया, जिन्हें राज्यपाल आरएन रवि ने राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए भेजा था। कोर्ट ने इन विधेयकों को मंजूरी दे दी। फैसले में न्यायालय ने गृह मंत्रालय की ओर से पहले से निर्धारित समयसीमा को उपयुक्त मानते हुए उसे ही लागू करने की बात कही। साथ ही यह भी कहा कि राज्यों को भी सहयोगात्मक रवैया अपनाते हुए उठाए गए प्रश्नों के उत्तर देने चाहिए और केंद्र सरकार के सुझावों पर शीघ्रता से विचार करना चाहिए।
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