April 17, 2026

बसपा का सियासी सफर संकट में: उपचुनाव में करारी हार, दलित वोट बैंक भी खिसका—क्या मायावती की राजनीति का दौर खत्म हो रहा है?

उत्तर प्रदेश में हाल ही में हुए उपचुनाव ने राज्य की राजनीतिक तस्वीर को एक बार फिर साफ कर दिया है—मुख्य मुकाबला सिर्फ भाजपा और समाजवादी पार्टी (सपा) के बीच रह गया है, जबकि बहुजन समाज पार्टी (बसपा) पूरी तरह हाशिए पर चली गई है। नौ विधानसभा सीटों के नतीजों में भाजपा और रालोद गठबंधन ने 7 सीटों पर, और सपा ने 2 सीटों पर जीत दर्ज की है। वहीं बसपा के प्रत्याशी अपनी जमानत तक नहीं बचा सके, जो कि पार्टी सुप्रीमो मायावती के लिए गहरा झटका है।

“नाक बनाम साख” की लड़ाई में बसपा नदारद

इन उपचुनावों को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की प्रतिष्ठा और अखिलेश यादव की साख से जोड़कर देखा जा रहा था। दोनों दलों के बीच जुबानी जंग भी चुनाव से पहले ही तेज़ हो गई थी। राजनीतिक विश्लेषकों ने इसे “योगी की नाक बनाम सपा की साख” की लड़ाई कहा था। लेकिन इस पूरे चुनावी समर में मायावती और उनकी पार्टी कहीं भी सक्रिय भूमिका में नहीं दिखे, और यही उनकी हार की सबसे बड़ी वजह मानी जा रही है।

बसपा उम्मीदवारों के प्रदर्शन ने खोली पार्टी की कमजोरी

बसपा उम्मीदवारों को मिले वोटों ने साफ कर दिया कि पार्टी अब अपने पारंपरिक दलित वोट बैंक को भी साधने में नाकाम हो रही है। कुछ प्रमुख आंकड़े:

सीसामऊ से वीरेंद्र कुमार – 1410 वोट

कुंदरकी से रफतउल्ला – 955 वोट

करहल से अविनाश शाक्य – 8409 वोट

गाजियाबाद से परमानंद गर्ग – 10736 वोट

अन्य सीटों पर भी प्रदर्शन बेहद खराब रहा

यह प्रदर्शन दिखाता है कि पार्टी अब युवा और दलित मतदाताओं के बीच अपना आकर्षण खो चुकी है।

2019 से अब तक लगातार गिरता ग्राफ

2019 में सपा के साथ गठबंधन कर बसपा ने 10 लोकसभा सीटें जीती थीं, लेकिन उसके बाद से उसका ग्राफ लगातार गिरता चला गया।

2022 विधानसभा चुनाव: सिर्फ 1 सीट

2024 लोकसभा चुनाव: 80 में 0 सीट

2025 उपचुनाव: सभी उम्मीदवारों की जमानत जब्त

रणनीति विफल, जनता से दूरी

बसपा के लगातार खराब प्रदर्शन के पीछे कमजोर रणनीति, ग्राउंड लेवल पर मौजूदगी की कमी और जनता से संवादहीनता बड़ी वजह मानी जा रही है। मायावती यह मानकर चल रही थीं कि भाजपा से नाराजगी और सपा के खिलाफ विरोध उन्हें फायदा देगा, लेकिन जनता ने उन्हें नकार दिया।

क्या मायावती के नेतृत्व में बसपा की राजनीति ढलान पर है?

बसपा अब अपने पारंपरिक आधार को भी खोती जा रही है। जाटव बिरादरी को छोड़ दें, तो बाकी दलित वर्ग पहले ही अन्य पार्टियों की ओर मुड़ चुका है। युवा मतदाता भी अब बसपा से जुड़ाव नहीं रखता। विश्लेषकों का मानना है कि अगर पार्टी ने नीतियों और रणनीति में बदलाव नहीं किया, तो उसका अस्तित्व बचाना भी मुश्किल हो सकता है।

एक दौर में सत्ता की धुरी रही पार्टी आज हाशिए पर—क्या बहुजन राजनीति को फिर से संजीवनी मिलेगी या यह अंत की शुरुआत है?

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