April 20, 2026

सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के विवादास्पद आदेश पर लगाई रोक

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक विवादास्पद आदेश पर स्वत: संज्ञान लेते हुए सुनवाई की, जिसमें रेप के आरोप की परिभाषा को लेकर टिप्पणी की गई थी। कोर्ट ने हाई कोर्ट की टिप्पणी पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी और इस मामले की गंभीरता को देखते हुए जांच और सुनवाई की दिशा में कदम उठाए। इस मामले की सुनवाई जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ द्वारा की जा रही थी।

सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले पर गहरी आपत्ति जताते हुए कहा कि यह निर्णय संवेदनशीलता की कमी और विवेकहीनता को दर्शाता है। कोर्ट ने विशेष रूप से उन पैरा 21, 24 और 26 की टिप्पणियों को अमानवीय और कानूनी दृष्टिकोण से गलत करार दिया, जिनमें रेप की परिभाषा को लेकर विवादास्पद विचार व्यक्त किए गए थे। कोर्ट ने कहा, “हम आमतौर पर इस स्तर पर स्थगन देने में हिचकिचाते हैं, लेकिन चूंकि यह मामला कानून के सिद्धांतों के खिलाफ है, और महिलाओं के खिलाफ अपराध को नकारता है, इसलिए हम इन टिप्पणियों पर रोक लगाते हैं।”

इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले में नाबालिग के स्तनों को पकड़ने और पायजामे का नाड़ा खींचने को रेप या रेप के प्रयास के अपराध के रूप में न मानने की बात की गई थी। जस्टिस राम मनोहर नारायण मिश्रा की ओर से पारित इस आदेश में कहा गया था कि ऐसा अपराध केवल जब किसी महिला को निर्वस्त्र करने या नग्न करने का उद्देश्य हो, तब ही उसे आपराधिक बल का मामला माना जाएगा।

इस फैसले के बाद, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र, उत्तर प्रदेश सरकार और इलाहाबाद हाई कोर्ट से पक्षकारों को नोटिस जारी किया है। इसके अलावा, पीड़िता की मां द्वारा दायर याचिका को भी इस मामले में शामिल किया गया है।

इलाहाबाद हाई कोर्ट के इस विवादास्पद आदेश की जमकर आलोचना हो रही है। कानूनी विशेषज्ञों और समाजसेवियों ने इस पर नाखुशी जाहिर करते हुए कहा कि न्यायपालिका को इस तरह के संवेदनशील मुद्दों पर ज्यादा जिम्मेदारी और संवेदनशीलता के साथ टिप्पणी करनी चाहिए। उनका मानना है कि इस तरह के फैसले से न्यायपालिका पर लोगों का विश्वास कम हो सकता है।

इलाहाबाद हाई कोर्ट की यह टिप्पणी उस समय आई थी, जब दो व्यक्तियों ने कासगंज के एक विशेष जज के आदेश को चुनौती दी थी, जिन्होंने भारतीय दंड संहिता की धारा 376 (रेप) के तहत आरोप तय किए थे। इस टिप्पणी ने देशभर में कानूनी और सामाजिक बहस छेड़ दी है, जहां एक ओर महिलाओं के खिलाफ अपराधों की बढ़ती घटनाओं पर चिंता जताई जा रही है, वहीं दूसरी ओर न्यायिक गलती के मामले में जजों से संवेदनशीलता की अपेक्षाएं भी तेज हो रही हैं।

अब सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप से उम्मीद की जा रही है कि इस मामले में एक मजबूत और संवेदनशील निर्णय आएगा, जो कानून और न्याय की सही समझ को प्रकट करेगा।

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