June 11, 2026

धनखड़ ने एनजेएसी पर जताई चिंता, सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर सवाल

राज्यसभा के अध्यक्ष जगदीप धनखड़ ने शुक्रवार को राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (एनजेएसी) का जिक्र किया, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने 2015 में असंवैधानिक करार दिया था। उन्होंने कहा कि अगर संसद में सर्वसम्मति से पारित किए गए तंत्र को लागू किया गया होता, तो न्यायिक जवाबदेही के मुद्दे का समाधान हो सकता था। इस मुद्दे पर कांग्रेस नेता जयराम रमेश द्वारा दिल्ली हाईकोर्ट के न्यायाधीश के आवास पर नकदी पाए जाने का सवाल उठाए जाने के बाद धनखड़ ने एनजेएसी का उल्लेख किया और इस विषय पर अपने विचार व्यक्त किए।

धनखड़ ने सदन को संबोधित करते हुए कहा, “आप सभी को याद होगा कि जिस तंत्र को इस सदन ने सर्वसम्मति से पारित किया था, बिना किसी मतभेद के, सभी राजनीतिक दल एकजुट होकर, सरकार की पहल के लिए इसे समर्थन दे रहे थे।” उन्होंने यह भी कहा कि यह ऐतिहासिक कानून 2014 में पारित किया गया था और भारतीय संसद से यह कानून बिना किसी विवाद के निकला था। इसके साथ ही, 16 राज्यों की विधानसभाओं ने इसका समर्थन किया और इस पर संविधान के अनुच्छेद 111 के तहत राष्ट्रपति के हस्ताक्षर भी हुए थे, लेकिन फिर इसे समाप्त कर दिया गया।

धनखड़ ने अदालतों में हुई विवादों और न्यायपालिका से संबंधित मामलों को लेकर अपनी चिंता भी व्यक्त की। उन्होंने कहा कि न्यायाधीश के आवास से नकदी मिलने के मामले में तुरंत कोई कार्रवाई नहीं हुई। उनका यह भी मानना था कि यदि यह मामला किसी राजनेता, नौकरशाह, या उद्योगपति से जुड़ा होता, तो इसका तुरंत विरोध किया जाता और उसे निशाना बनाया जाता। इसके साथ ही, उन्होंने उम्मीद जताई कि एक दिन सिस्टमेटिक प्रतिक्रिया सामने आएगी, जो पारदर्शी, जवाबदेह, और प्रभावी होगी।

एनजेएसी का इतिहास और सुप्रीम कोर्ट की प्रतिक्रिया
एनजेएसी को लेकर 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला दिया था कि न्यायपालिका सरकार के प्रति “ऋणग्रस्तता के जाल” में फंसने का जोखिम नहीं उठा सकती। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने न्यायिक नियुक्तियों पर सरकार के प्रभाव को नकारते हुए संविधानिक तौर पर इस आयोग को असंवैधानिक करार दिया था।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद, जगदीप धनखड़ ने पिछले दिसंबर में 55 सांसदों द्वारा हस्ताक्षरित याचिका का जिक्र किया। इस याचिका में इलाहाबाद हाई कोर्ट के जज शेखर कुमार यादव के खिलाफ महाभियोग चलाने की मांग की गई थी। धनखड़ ने कहा कि उनके कार्यालय ने याचिका पर हस्ताक्षर करने वाले सांसदों से प्रतिक्रिया मांगी है और इस संदर्भ में आवश्यक कदम उठाए हैं। उन्होंने यह भी बताया कि कुछ सांसदों की प्रतिक्रिया अभी बाकी है, लेकिन कई ने सकारात्मक जवाब दिया है।

धनखड़ ने यह भी कहा कि अगर याचिका पर हस्ताक्षर करने वालों की संख्या 50 से अधिक होती है, तो वे इस मुद्दे को आगे बढ़ाएंगे। उनके अनुसार, यह कदम न्यायपालिका की जवाबदेही और पारदर्शिता को सुनिश्चित करने के लिए जरूरी है।

क्या है एनजेएसी?
एनजेएसी का गठन 2014 में मोदी सरकार द्वारा किया गया था, ताकि न्यायाधीशों की नियुक्ति का अधिकार सरकार के पास हो। इस आयोग में चीफ जस्टिस, कानून मंत्री, और अन्य छह सदस्य शामिल होने थे। हालांकि, 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने इस आयोग को असंवैधानिक करार देते हुए यह कहा कि न्यायपालिका को सरकार से स्वतंत्र रहना चाहिए और आयोग सरकार के प्रभाव में आने का जोखिम था।

अब यह सवाल फिर उठ खड़ा हुआ है कि क्या न्यायिक नियुक्तियों में सरकार का हस्तक्षेप करना जरूरी है, और क्या न्यायपालिका की जवाबदेही के लिए कोई नई प्रणाली लागू की जा सकती है। धनखड़ का कहना है कि एनजेएसी कानून ने इस बीमारी से निपटने के लिए गंभीर कदम उठाए थे, और इसकी आवश्यकता आज भी बनी हुई है।

यह स्थिति और इन विवादों के बीच, देश के न्यायिक तंत्र में सुधार की दिशा में क्या कदम उठाए जाएंगे, यह आने वाले समय में देखना होगा।

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