April 20, 2026

उत्तर कन्नड़ में 40 साल बाद भी एंडोसल्फान का प्रभाव, विकलांग बच्चों की बढ़ती संख्या

कर्नाटक के उत्तर कन्नड़ जिले में चालीस साल पहले, काजू बागानों की उपज बढ़ाने और रोगों को नियंत्रित करने के लिए एंडोसल्फान नामक रासायनिक पदार्थ का छिड़काव किया गया था। हालांकि, इसका प्रभाव अब भी खत्म नहीं हुआ है और आज भी इस क्षेत्र में पैदा होने वाले बच्चों में विकलांगताएँ देखी जा रही हैं। यह स्थिति कुछ हद तक हिरोशिमा और नागासाकी में हुए परमाणु हमलों के बाद पैदा होने वाले विकलांग बच्चों की तरह है, जहां विकलांगताएँ लंबे समय तक प्रभाव डालती रही हैं।

एंडोसल्फान का लंबा प्रभाव

उत्तर कन्नड़ जिले में काजू की पैदावार को बढ़ाने के उद्देश्य से 1980 के दशक में एंडोसल्फान का छिड़काव किया गया था। इस रासायनिक दवा का असर आज भी देखने को मिल रहा है, और इसमें कोई शक नहीं है कि इसके कारण विकलांगताएँ पैदा हो रही हैं। रिकॉर्ड के अनुसार, एंडोसल्फान के छिड़काव के कारण 6,914 लोग विकलांगताओं से पीड़ित हुए हैं, जिनमें से 3,607 लोग दक्षिण कन्नड़, 1,514 लोग उडुपी और 1,793 लोग उत्तर कन्नड़ जिले से हैं।

नए विकलांग बच्चों का जन्म

उत्तर कन्नड़ जिले में इस मामले पर हाल ही में 2015-16 के दौरान एक सर्वेक्षण किया गया था, और फिर 2024 में एक और परित्यक्त मामलों का सर्वेक्षण किया गया। इस सर्वेक्षण में भटकल, सिरसी-सिद्धपुर, शिराली, कुमटा, होन्नावर और अंकोला जैसे क्षेत्रों में नए विकलांग मामलों का पता चला। इस दौरान 631 नए मामले सामने आए हैं। डीएचओ डॉ. नीरज ने बताया कि विशेषज्ञ डॉक्टरों द्वारा इन मामलों का परीक्षण किया गया है, और विभाग ने नए पाए गए विकलांग बच्चों को विकलांगता प्रमाण पत्र जारी करना शुरू कर दिया है।

सर्वेक्षण का दूसरा चरण: पीढ़ी दर पीढ़ी प्रभाव?

डॉ. नीरज ने बताया कि पहले किए गए सर्वेक्षण में यह पता लगाया गया था कि 1985 से लेकर 2010-11 तक एंडोसल्फान के प्रभाव से कौन प्रभावित हुआ। अब दूसरे चरण में उन लोगों की पहचान की जा रही है, जो पहले से छूट गए थे और जिनकी स्थिति पर अभी ध्यान नहीं दिया गया था। इसके अलावा, यह संभावना भी जताई जा रही है कि एंडोसल्फान का प्रभाव अब दूसरी पीढ़ी पर भी असर डाल रहा हो, और इसकी जांच की आवश्यकता है। हालांकि, डॉ. नीरज ने यह भी स्पष्ट किया कि सर्वेक्षण में 10 वर्ष से कम आयु का कोई बच्चा विकलांगता के साथ नहीं पाया गया है।

स्वास्थ्य संकट और सरकार की भूमिका

यह रासायनिक प्रदूषण और उसके दुष्प्रभावों को लेकर अब सवाल उठने लगे हैं कि क्या यह स्वास्थ्य संकट और पर्यावरणीय प्रभाव भारतीय स्वास्थ्य नीति के लिए एक बड़ा संकेत है। पिछले कुछ दशकों से पर्यावरणीय प्रदूषण और रासायनिक पदार्थों के दुष्प्रभावों को लेकर कई चिंताएँ उठाई जा रही हैं, लेकिन इस मामले ने एक गंभीर स्वास्थ्य संकट की ओर इशारा किया है। सरकार के लिए यह समय है कि वह इस समस्या को प्राथमिकता दे और प्रभावित क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की और भी मजबूत व्यवस्था करे।

क्या कर्नाटक में यह प्रदूषण और विकलांगता की समस्या आने वाले दशकों में भी बनी रहेगी? क्या सरकार और वैज्ञानिकों को और तेजी से इस पर कदम उठाने की आवश्यकता है? उत्तर कन्नड़ जिले के इस घातक रासायनिक प्रभाव पर अब हर किसी की नजरें हैं, और यह देखना होगा कि इसके स्थायी समाधान के लिए क्या उपाय किए जाएंगे।

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