April 25, 2026

जम्मू-कश्मीर में शराबबंदी पर बड़ा फैसला? विधानसभा में तीन दलों ने पेश किया बिल!

श्रीनगर: जम्मू-कश्मीर में अगले महीने से शुरू हो रहे बजट सत्र से पहले एक अहम मुद्दे पर सियासी संग्राम तेज हो गया है। पीडीपी, नेशनल कांफ्रेंस और अवामी इत्तिहाद पार्टी (AIP) समेत कई राजनीतिक दलों ने राज्य में शराब पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने के लिए विधानसभा में प्राइवेट मेंबर बिल पेश किया है।

 

यह कदम इसलिए अहम है क्योंकि बीते कुछ वर्षों में राज्य में शराब की दुकानों की संख्या तेजी से बढ़ी है, जिससे सामाजिक और सांस्कृतिक प्रभावों को लेकर चिंता बढ़ रही है। दिलचस्प बात यह है कि आमतौर पर एक-दूसरे के विरोधी रहने वाले राजनीतिक दल इस मुद्दे पर एकजुट नजर आ रहे हैं।

 

पीडीपी ने उठाई पहल, इल्तिजा मुफ्ती ने किया समर्थन

 

पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (PDP) के विधायक मीर मोहम्मद फैयाज ने जम्मू-कश्मीर विधानसभा में शराबबंदी का विधेयक पेश किया है। इस पर पीडीपी नेता इल्तिजा मुफ्ती ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर कहा,

“शराब की बढ़ती खपत समाज को तबाह कर रही है और यह हमारे सांस्कृतिक मूल्यों के लिए गंभीर खतरा बनती जा रही है।”

 

इल्तिजा ने दावा किया कि 2019 के बाद से राज्य में शराब की दुकानों की संख्या में भारी इजाफा हुआ है, जिससे यह समस्या और जटिल हो गई है।

 

AIP और नेशनल कांफ्रेंस भी बिल के समर्थन में

 

इस पहल को अवामी इत्तिहाद पार्टी (AIP) ने भी समर्थन दिया है। पार्टी के विधायक शेख खुर्शीद अहमद ने भी विधानसभा में शराबबंदी पर एक विधेयक पेश किया है। उन्होंने कहा,

“अगर अभी इस लत को नहीं रोका गया तो यह समाज के लिए विनाशकारी साबित होगी।”

 

वहीं, नेशनल कांफ्रेंस (NC) के विधायक अहसान परदेसी ने भी इस बिल का समर्थन करते हुए कहा कि कश्मीर के धार्मिक और सांस्कृतिक मूल्यों के खिलाफ शराब की अनियंत्रित बिक्री एक गंभीर मुद्दा है। उन्होंने मांग की कि राज्य के मुस्लिम बहुल इलाकों में शराब की दुकानों को बंद किया जाए।

 

भाजपा का भी समर्थन, सरकार पर बढ़ा दबाव?

 

सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने भी इस मुद्दे पर समर्थन जताया है। आमतौर पर विपक्ष में रहने वाले दलों का इस तरह एक साथ आना यह इशारा कर रहा है कि जम्मू-कश्मीर में शराबबंदी एक बड़ा चुनावी मुद्दा बन सकता है।

 

अब सवाल यह है कि क्या उमर अब्दुल्ला सरकार इस बिल को मंजूरी देगी? या फिर राजनीतिक समीकरण इस मामले को और उलझा देंगे? आने वाले बजट सत्र में

यह मुद्दा गरमा सकता है।

 

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