पश्चिम बंगाल में मतुआ समुदाय के लाखों लोगों के नाम मतदाता सूची से हटाए जाने के बाद राज्य की राजनीति में बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के तहत हुई इस कार्रवाई से न सिर्फ मतुआ समुदाय के बीच हड़कंप मचा है, बल्कि नागरिकता और पहचान को लेकर भी गंभीर सवाल उठने लगे हैं। चुनाव से पहले बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम हटने से राजनीतिक माहौल गरमा गया है और यह मुद्दा राज्य की राजनीति में अहम भूमिका निभाने वाले इस समुदाय के कारण और संवेदनशील बन गया है।
सूत्रों के अनुसार, भारतीय निर्वाचन आयोग ने वर्ष 2002 के बाद पहली बार मतदाता सूची की व्यापक और गहन जांच शुरू की थी। इस प्रक्रिया के तहत जिन लोगों का नाम 2002 की मतदाता सूची में दर्ज नहीं था, उनसे पहचान और नागरिकता से जुड़े दस्तावेज प्रस्तुत करने को कहा गया। जिन मतदाताओं के पास आवश्यक दस्तावेज उपलब्ध नहीं थे, उनके नाम सूची से हटा दिए गए। नवंबर से अब तक करीब 63 लाख से अधिक नाम हटाए जा चुके हैं, जबकि लगभग 60 लाख नामों की जांच अभी भी जारी बताई जा रही है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, राज्य की कई मतुआ-बहुल विधानसभा सीटों पर 25 हजार से 40 हजार तक मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं। मतुआ समुदाय का पश्चिम बंगाल की करीब 50 विधानसभा सीटों पर सीधा प्रभाव माना जाता है, जिससे चुनावी परिणामों पर इसका बड़ा असर पड़ सकता है। वर्ष 2019 के बाद से इस समुदाय का झुकाव बड़े पैमाने पर भारतीय जनता पार्टी की ओर माना जाता रहा है। ऐसे में मतदाता सूची से नाम हटने की घटना राजनीतिक दलों के लिए चुनावी चुनौती बन गई है और इसे लेकर आरोप-प्रत्यारोप का दौर तेज हो गया है।
इस मुद्दे पर तृणमूल कांग्रेस ने सवाल उठाते हुए कहा है कि 2002 के बाद राज्य में आए कई लोगों के पास आवश्यक दस्तावेज नहीं हैं, जिसके कारण उनके नाम हटाए जा रहे हैं और वे मतदान के अधिकार से वंचित हो सकते हैं। वहीं राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी शुरुआत से ही SIR प्रक्रिया का विरोध करती रही हैं और इसे आम नागरिकों के अधिकारों से जुड़ा गंभीर मामला बताया है। दूसरी ओर केंद्र सरकार के प्रतिनिधियों ने भरोसा दिलाया है कि यदि किसी शरणार्थी का नाम सूची से हटता है तो उसे नागरिकता से जुड़े कानूनी प्रावधानों के तहत राहत मिल सकती है।
विधानसभा चुनाव से पहले बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम हटने से राज्य में सियासी तापमान लगातार बढ़ता जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मतुआ समुदाय का वोट बैंक चुनावी परिणामों को प्रभावित करने की क्षमता रखता है, इसलिए यह मुद्दा आने वाले दिनों में और बड़ा रूप ले सकता है। फिलहाल सभी की नजर इस बात पर टिकी है कि जांच प्रक्रिया के बाद कितने नाम बहाल होते हैं और यह विवाद आगामी चुनावी समीकरणों को किस दिशा में ले जाता है।
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