वृंदावन: प्रेमानंद महाराज ने भक्त के सवाल का दिया जवाब – “यदि मैं मर गया तो मुक्ति किसे होगी?”
प्रेमानंद महाराज वृंदावन के विख्यात संत और अध्यात्मिक गुरु हैं, जो लोगों को भक्ति और ईश्वर के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देते हैं। उनके आश्रम में हर आम और खास व्यक्ति उनके प्रवचन सुनने आता है और जीवन व अध्यात्म से जुड़े प्रश्नों के उत्तर पाता है। हाल ही में एक भक्त प्रेमानंद महाराज के दरबार में अपनी दुविधा लेकर आया। उसने पूछा कि साधना का अंत अहंकार के नष्ट होने से होता है, लेकिन अगर मैं मर गया तो मुक्ति का अनुभव किसे होगा?
प्रेमानंद महाराज ने समझाया कि साधना के दौरान भजन और ध्यान से अविद्या, माया और भ्रम का नाश होता है। उन्होंने कहा, “जिस समय हम साधना करते हैं, उस समय हमारा अहंकार, देहाभिमान और ‘मैं’ का भ्रम धीरे-धीरे मिटता है। जैसे हम धनवान या बलवान हैं, उसी अहंकार के आगे जो कुछ भी प्रतीत होता है, वह अशुद्ध हो जाता है। साधना से यह अशुद्धता और भ्रम समाप्त हो जाता है।”
महाराज ने आगे स्पष्ट किया कि साधना के बाद जो शुद्ध ब्रह्म स्वरूप बचता है, वही मुक्ति का अनुभव होता है। उन्होंने कहा कि “मैं का नाश होने के बाद, व्यक्ति को अपने अंदर शुद्ध ब्रह्म का अनुभव होने लगता है। इस प्रकार मृत्यु या देह का अंत केवल शारीरिक है, लेकिन जो शुद्ध ब्रह्म स्वरूप बचता है, वही वास्तविक मुक्ति का अनुभव कराता है।”
भक्तों के लिए यह संदेश जीवन और साधना दोनों के महत्व को रेखांकित करता है। प्रेमानंद महाराज की व्याख्या यह समझाती है कि भौतिक देह की समाप्ति से मुक्ति नहीं छीनती, बल्कि साधना और अहंकार के नाश से वास्तविक अनुभव प्राप्त होता है। उनके शब्द लोगों को आत्मज्ञान और भक्ति के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करते हैं।
इस प्रकार, प्रेमानंद महाराज ने यह सिद्ध कर दिया कि मृत्यु का भय और अहंकार का भ्रम साधना द्वारा मिटाया जा सकता है और शुद्ध ब्रह्म स्वरूप ही मुक्ति का वास्तविक अनुभव है।
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