मोदी सरकार ने सरेंडर कर दिया, Indo-US ट्रेड डील पर भड़का विपक्ष, संसद में चर्चा की मांग
भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित अंतरिम ट्रेड डील की रूपरेखा सामने आने के बाद देश की राजनीति में तीखी बहस शुरू हो गई है। दोनों देशों की ओर से जारी संयुक्त बयान में अमेरिकी बाजार में भारतीय उत्पादों के लिए टैरिफ में बड़ी राहत और भारतीय निर्यातकों के लिए नए अवसरों की बात कही गई है। सरकार का दावा है कि इस समझौते से खासकर एमएसएमई, किसान और मछुआरों को बड़ा फायदा होगा, जबकि विपक्ष इसे भारत के उद्योग और कृषि हितों के लिए खतरनाक बता रहा है।
विपक्षी दलों का कहना है कि इस ट्रेड डील के जरिए भारत ने बिना पर्याप्त शर्तों के अपने बाजार अमेरिकी उत्पादों के लिए खोल दिए हैं। कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने सवाल उठाया कि क्या सरकार ने औद्योगिक और कृषि क्षेत्रों को पूरी तरह अमेरिका के लिए खोलने पर सहमति दे दी है। उनका तर्क है कि समझौते की भाषा से संकेत मिलता है कि कई क्षेत्रों में टैरिफ खत्म या काफी हद तक कम किए जाएंगे, जिसका सीधा असर घरेलू उत्पादकों पर पड़ेगा।
कांग्रेस नेताओं ने यह भी आशंका जताई कि अमेरिकी कृषि और खाद्य उत्पादों के सस्ते आयात से भारतीय किसानों को कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ेगा। उदित राज ने कहा कि भारतीय किसान अमेरिकी उत्पादों की गुणवत्ता और कीमत से मुकाबला नहीं कर पाएंगे। उन्होंने यह आरोप भी लगाया कि समझौते में रूस से सस्ता तेल खरीदने को लेकर भारत की सहमति कमजोर हुई है, जिससे वैकल्पिक स्रोतों से महंगा तेल आयात करना पड़ सकता है और परिवहन लागत भी बढ़ेगी।
समाजवादी पार्टी और शिवसेना (यूबीटी) समेत अन्य विपक्षी दलों ने भी इस डील को लेकर सरकार पर हमला बोला है। विपक्ष का कहना है कि अमेरिका जहां भारतीय उत्पादों पर अब भी 18 प्रतिशत तक टैरिफ लगाए रखेगा, वहीं भारत कई अमेरिकी उत्पादों पर शुल्क घटाने या हटाने की दिशा में बढ़ रहा है। इसे वे असंतुलित और देश के सम्मान के खिलाफ करार दे रहे हैं।
विपक्ष की साझा मांग है कि इस ट्रेड डील पर संसद में क्लॉज-दर-क्लॉज विस्तृत बहस होनी चाहिए, ताकि यह साफ हो सके कि सरकार ने किन शर्तों पर सहमति दी है और इसके दीर्घकालिक प्रभाव क्या होंगे। उनका कहना है कि बिना संसदीय चर्चा के ऐसे समझौते करना लोकतांत्रिक प्रक्रिया और राष्ट्रीय हितों दोनों के लिए नुकसानदेह हो सकता है।
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