सिंगूर में ममता के आंदोलन से टाटा की विदाई और अब मोदी की वापसी, बंगाल की राजनीति में फिर गरमाया विकास बनाम सत्ता का सवाल
पश्चिम बंगाल के हुगली जिले का सिंगूर एक बार फिर सियासी बहस के केंद्र में है। यही वह जगह है, जहां करीब दो दशक पहले टाटा मोटर्स की नैनो परियोजना को लेकर हुआ भूमि अधिग्रहण विवाद राज्य की राजनीति की दिशा बदल गया था। उस समय ममता बनर्जी के नेतृत्व में हुए उग्र आंदोलन ने न सिर्फ टाटा को सिंगूर छोड़ने पर मजबूर किया, बल्कि वर्षों से सत्ता में रही लेफ्ट सरकार की नींव भी हिला दी। अब, 2026 के विधानसभा चुनाव से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का सिंगूर दौरा इसी पुराने विवाद को नए राजनीतिक संदर्भ में सामने ला रहा है।
साल 2006 में लेफ्ट फ्रंट ने भारी बहुमत से चुनाव जीतकर सत्ता में वापसी की थी। मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने राज्य में औद्योगीकरण और रोजगार सृजन को प्राथमिकता देते हुए टाटा मोटर्स को सिंगूर में नैनो कार फैक्ट्री लगाने का प्रस्ताव दिया। करीब एक हजार एकड़ जमीन अधिग्रहित की गई और प्लांट का निर्माण भी शुरू हुआ। लेकिन जल्द ही जमीन अधिग्रहण को लेकर स्थानीय किसानों और विपक्षी दलों में असंतोष फैलने लगा, जिसे ममता बनर्जी ने एक बड़े जन आंदोलन में बदल दिया।
2007 में ममता बनर्जी ने “उपजाऊ कृषि भूमि बचाने” के नाम पर लेफ्ट सरकार के खिलाफ आंदोलन छेड़ दिया। सिंगूर जाने से रोके जाने पर उन्होंने कोलकाता में 26 दिन का अनशन किया, जिसे बुद्धिजीवियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का भी समर्थन मिला। इसी दौरान नंदीग्राम में हुए भूमि अधिग्रहण विरोधी आंदोलन ने भी लेफ्ट सरकार की छवि को गंभीर नुकसान पहुंचाया। अदालत से अधिग्रहण को वैध ठहराए जाने के बावजूद आंदोलन थमा नहीं और आखिरकार 2008 में टाटा मोटर्स ने सिंगूर से हटने का फैसला कर लिया।
टाटा के बंगाल छोड़ने के बाद गुजरात सरकार ने नैनो परियोजना को साणंद में जमीन दी। उस समय गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी थे। 2010 में जब वहां पहली नैनो कार बनी, तब रतन टाटा ने गुजरात सरकार और मोदी के सहयोग की सार्वजनिक रूप से सराहना की। बाद में मोदी ने यह भी बताया कि कैसे रतन टाटा को भेजे गए एक छोटे से “वेलकम” संदेश ने इस परियोजना को नया ठिकाना दिलाने में भूमिका निभाई।
अब, जब प्रधानमंत्री मोदी सिंगूर में करीब 830 करोड़ रुपये की विकास परियोजनाओं का उद्घाटन करने जा रहे हैं, तो यह दौरा केवल विकास योजनाओं तक सीमित नहीं माना जा रहा। भाजपा इसे ममता बनर्जी के उस आंदोलन की याद दिलाने के तौर पर पेश कर रही है, जिसे वह राज्य के औद्योगिक पिछड़ेपन की वजह मानती है। वहीं, तृणमूल कांग्रेस के लिए सिंगूर अब भी जन आंदोलनों और सत्ता परिवर्तन का प्रतीक है। ऐसे में, चुनावी साल में सिंगूर एक बार फिर बंगाल की राजनीति में विकास बनाम विरोध की बहस को तेज कर रहा है।
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