Gold Reserves & Price: दुनिया में किसके पास सबसे ज़्यादा सोना, और भारत इस रेस में कहां खड़ा है?
दुनिया भर के केंद्रीय बैंक हाल के वर्षों में अपनी तिजोरियों को सोने से भरने में पूरी तरह व्यस्त हैं। अमेरिका इस दौड़ में सबसे आगे है, जिसके पास लगभग 8,100 टन सोना सुरक्षित है, जिसमें ज्यादातर फोर्ट नॉक्स जैसी हाई-सिक्योरिटी तिजोरियों में रखा गया है। जर्मनी करीब 3,300 टन सोने का भंडार रखता है, जबकि इटली और फ्रांस के पास लगभग 2,400 से 2,500 टन सोना है। ये आंकड़े दिखाते हैं कि विकसित अर्थव्यवस्थाएं अपने देश की आर्थिक सुरक्षा और मुद्रा की स्थिरता बनाए रखने के लिए सोने को प्राथमिकता दे रही हैं।
पिछले दशक में रूस और चीन सोने के सबसे आक्रामक खरीदार बने हैं। रूस ने पश्चिमी प्रतिबंधों और डॉलर पर निर्भरता कम करने की रणनीति के तहत तेजी से सोना खरीदा, जबकि चीन धीरे-धीरे यूएस ट्रेजरी बॉन्ड से दूरी बनाकर गोल्ड और अन्य कमोडिटी-बैक्ड एसेट्स में निवेश बढ़ा रहा है। इन दोनों देशों ने अपने रिज़र्व में लगभग 2,300 टन सोना जमा कर लिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि सोना सिर्फ निवेश का साधन नहीं बल्कि भू-राजनीतिक सुरक्षा का एक बड़ा हथियार बन गया है, जो वैश्विक अस्थिरता और युद्ध जैसी परिस्थितियों में देशों को मजबूती प्रदान करता है।
भारत इस रेस में अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश कर रहा है, लेकिन चुनौती बड़ी है। भारतीय रिजर्व बैंक के पास लगभग 800–900 टन आधिकारिक सोना है, जो टॉप 10 देशों की सूची में शामिल है, लेकिन भारत की आबादी और लगातार बढ़ती खपत के लिहाज से यह पर्याप्त नहीं माना जाता। बढ़ती अंतरराष्ट्रीय कीमतों और सोने के आयात के कारण भारत का चालू खाता घाटा बढ़ता है और रुपए पर दबाव पड़ता है। यही वजह है कि भारत सरकार ने गोल्ड बॉन्ड, गोल्ड ETF और हॉलमार्किंग जैसी योजनाओं के जरिए लोगों को फाइनेंशियल गोल्ड में निवेश करने की दिशा में प्रोत्साहित किया है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सोने की कीमतों में तेजी के कई कारण हैं। सबसे प्रमुख हैं – रूस-यूक्रेन युद्ध, वेस्ट एशिया में तनाव और ताइवान की स्थिति जैसी भू-राजनीतिक अस्थिरताएं, मुद्रास्फीति और मंदी का डर, और सेंट्रल बैंकों द्वारा रिकॉर्ड-स्तरीय खरीदी। इन कारकों के चलते सोना निवेशकों के लिए एक सुरक्षित विकल्प के रूप में उभरा है और इसे केवल गहना या निवेश का साधन नहीं बल्कि आर्थिक सुरक्षा का प्रतीक माना जाने लगा है।
भविष्य में भारत के लिए चुनौती डबल है – एक तरफ आम जनता की सांस्कृतिक मांग और दूसरी तरफ राष्ट्रीय सुरक्षा तथा रिजर्व प्रबंधन। यदि भारत अपने आधिकारिक गोल्ड रिज़र्व को संतुलित तरीके से बढ़ाए, लोकल गोल्ड रीसाइक्लिंग को बढ़ावा दे और डिजिटल/फाइनेंशियल गोल्ड प्रोडक्ट्स को मजबूत करे, तो यह सोने की भारी मांग को एक आर्थिक शक्ति में बदल सकता है। साफ़ है कि सोना अब केवल गहना नहीं बल्कि भूराजनीतिक ढाल, आर्थिक बीमा और सेंट्रल बैंकों का सबसे बड़ा हथियार बन चुका है, जबकि भारत अपनी आधिकारिक तैयारी में अभी थोड़ा पीछे नजर आता है।
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