संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन में मैक्रों का बड़ा ऐलान, इजराइल-फिलिस्तीन विवाद पर टू-नेशन समाधान की नई उम्मीद
फिलिस्तीन को लेकर पश्चिमी देशों का रुख लगातार बदल रहा है। ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और पुर्तगाल के बाद अब फ्रांस ने भी फिलिस्तीन को आधिकारिक तौर पर राष्ट्र के रूप में मान्यता दे दी है। फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में यह घोषणा की, जिससे सभा में मौजूद 140 से अधिक नेताओं ने जोरदार तालियां बजाईं। यह ऐलान ऐसे समय पर हुआ है जब गाज़ा और वेस्ट बैंक में इजराइल की कार्रवाइयों को लेकर तनाव चरम पर है।
मैक्रों ने कहा कि मिडिल ईस्ट में शांति और टू-नेशन समाधान के प्रति फ्रांस की ऐतिहासिक प्रतिबद्धता है। उन्होंने कहा कि “फिलिस्तीन राज्य की मान्यता हमारा नैतिक कर्तव्य है।” यह ऐलान फ्रांस और सऊदी अरब की अध्यक्षता में आयोजित संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन के दौरान किया गया। इस बैठक में फिलिस्तीनी राष्ट्रपति महमूद अब्बास को भी वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के ज़रिए संबोधित करना था, लेकिन अमेरिकी वीजा न मिलने के कारण वे व्यक्तिगत रूप से शामिल नहीं हो सके।
संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने भी फिलिस्तीन की मान्यता का समर्थन करते हुए कहा कि राज्य का दर्जा फिलिस्तीनियों का अधिकार है, किसी इनाम की तरह नहीं। दूसरी ओर, इजराइल और उसकी नेतन्याहू सरकार ने इस कदम का विरोध किया है। उनका कहना है कि फिलिस्तीन को मान्यता देने से हमास को फायदा होगा, जो गाज़ा के कुछ हिस्सों पर नियंत्रण रखता है। इजराइली सरकार ने चेतावनी दी है कि वह इसके जवाब में कठोर कदम उठा सकती है, जिसमें पश्चिमी तट पर और अधिक कब्ज़ा भी शामिल हो सकता है।
फिलिस्तीन की मान्यता को लेकर अमेरिका और इजराइल लगातार विरोध में हैं। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की प्रशासनिक टीम का कहना है कि इस तरह के कदम से शांति वार्ता पटरी से उतर जाएगी। वहीं, फिलिस्तीनी नेतृत्व इसे आज़ादी की ओर एक बड़ा कदम मान रहा है। संयुक्त राष्ट्र के 193 सदस्य देशों में से तीन-चौथाई पहले ही फिलिस्तीन को मान्यता दे चुके हैं, लेकिन अब प्रमुख पश्चिमी देशों का साथ मिलना उनके लिए मनोबल बढ़ाने वाला है।
फ्रांस और सऊदी अरब ने एक चरणबद्ध योजना भी पेश की है, जिसमें एक सुधारित फिलिस्तीनी प्राधिकरण अंतर्राष्ट्रीय सहयोग और मदद से वेस्ट बैंक और गाज़ा का प्रशासन संभालेगा। इस प्रस्ताव को संयुक्त राष्ट्र महासभा में भारी समर्थन मिला है। हालांकि, इजराइल का आरोप है कि फिलिस्तीनी नेतृत्व पूरी तरह शांति का पक्षधर नहीं है और उग्रवाद को बढ़ावा देता है।
टू-नेशन समाधान के समर्थकों का कहना है कि फिलिस्तीनी राज्य की मान्यता के बिना या तो इजराइल को मौजूदा स्थिति बनाए रखनी होगी, जिसमें लाखों फिलिस्तीनी बिना समान अधिकारों के रहेंगे, या फिर एक द्विराष्ट्रीय राज्य का रास्ता अपनाना होगा, जिसमें यहूदी बहुमत खत्म हो सकता है। ऐसे में फ्रांस का यह कदम न सिर्फ ट्रंप प्रशासन के लिए झटका है, बल्कि पश्चिम एशिया की राजनीति में नई हलचल का संकेत भी है।
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