लखनऊ: अनुभवी चालक चला रहे वीआईपी कार, नौसिखियों के हाथ में रोडवेज बसों की कमान, हादसों से बढ़ी चिंता
लखनऊ से एक चौंकाने वाली स्थिति सामने आई है। उत्तर प्रदेश परिवहन निगम के अनुभवी और नियमित चालक बसों की बजाय वीआईपी अधिकारियों की कार और इंटरसेप्टर चलाते नजर आ रहे हैं। वहीं, रोडवेज बसों की स्टीयरिंग उन संविदा चालकों को सौंप दी गई है, जो अनुभवहीन हैं और लापरवाही से बसें चलाकर हादसों को अंजाम दे रहे हैं। हाल ही में काकोरी में हुआ हादसा इसी लापरवाही की देन बताया जा रहा है।
हरदोई से लखनऊ आ रही एक रोडवेज बस बृहस्पतिवार को दुर्घटनाग्रस्त हो गई थी। जांच में पाया गया कि संविदा चालक बस को तय सीमा से ज्यादा रफ्तार में चला रहा था, जिसके कारण यह हादसा हुआ। इस मामले में मुकदमा भी दर्ज किया गया है। हादसे ने परिवहन विभाग में संविदा चालकों की कार्यशैली और नियमित चालकों की तैनाती पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
सूत्रों के मुताबिक, लखनऊ परिक्षेत्र में परिवहन निगम का एक हजार से अधिक बसों का बेड़ा है। इसमें करीब 800 नियमित चालक और 1500 संविदा चालक काम कर रहे हैं। इनमें से लगभग 250 नियमित चालक ऐसे हैं, जिन्हें शारीरिक अक्षमता या दृष्टि संबंधी समस्याओं के कारण मुख्यालय में ड्यूटी दी गई है। ऐसे में बसों की कमान संविदा चालकों को सौंप दी जाती है।
अधिकारियों का कहना है कि नियमित चालक बसों को सावधानीपूर्वक चलाते हैं और दुर्घटनाओं से बचाते हैं। जबकि संविदा चालक, जिनका वेतन अपेक्षाकृत कम है, कई बार लापरवाही कर बैठते हैं। पुराने संविदा चालकों को जहां लगभग 18 हजार रुपये तक मिलते हैं, वहीं नए चालकों को केवल 15 हजार रुपये तक का वेतन मिलता है। यही वजह है कि उनका मनोबल प्रभावित होता है और परिणामस्वरूप लापरवाही के मामले बढ़ जाते हैं।
हालांकि, परिवहन विभाग का दावा है कि संविदा चालकों की भर्ती एक सख्त प्रक्रिया से होती है। उनसे भारी वाहन चलाने का कम से कम तीन साल पुराना लाइसेंस मांगा जाता है और भर्ती से पहले टेस्ट तथा प्रशिक्षण भी कराया जाता है। इसके बाद सात दिन की ट्रायल ड्यूटी और कानपुर स्थित वर्कशॉप में टेस्ट लिया जाता है। समय-समय पर उनकी काउंसिलिंग और मेडिकल जांच भी होती है।
काकोरी हादसे को लेकर रोडवेज अधिकारियों ने कहा कि संविदा चालकों की कार्यप्रणाली पर सामान्य रूप से सवाल नहीं उठाए जा सकते। लेकिन यह साफ है कि जब अनुभवी चालक वीआईपी ड्यूटी में लगाए जाते हैं और बसों की जिम्मेदारी अनुभवहीन चालकों पर छोड़ दी जाती है, तो हादसों का खतरा बढ़ जाता है। यह स्थिति यात्रियों की सुरक्षा के लिए गंभीर चिंता का विषय बन गई है।
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