April 25, 2026

प्राइवेट नौकरी करने वालों को झटका: अब 9 नहीं, 12 घंटे करना होगा काम, महाराष्ट्र सरकार का बड़ा फैसला

महाराष्ट्र सरकार ने प्राइवेट सेक्टर के कर्मचारियों के लिए कामकाज से जुड़े नियमों में बड़ा बदलाव किया है। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व वाली सरकार ने कर्मचारियों के कार्य घंटों की सीमा बढ़ाने का निर्णय लिया है। अब तक निजी क्षेत्र में काम करने वालों के लिए अधिकतम कार्य समय 9 घंटे तय था, लेकिन नए नियमों के तहत इसे पहले 10 घंटे और धीरे-धीरे 12 घंटे तक बढ़ाने की योजना है। सरकार का तर्क है कि यह बदलाव उद्योगों की उत्पादकता बढ़ाने और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धा के लिए जरूरी है। हालांकि, इस फैसले ने नौकरीपेशा युवाओं और कर्मचारियों में गहरी चिंता पैदा कर दी है।

नए नियमों के मुताबिक, कर्मचारियों को अब रोजाना 9 घंटे के बजाय 10 घंटे काम करना होगा और आने वाले समय में यह अवधि 12 घंटे तक कर दी जाएगी। इसके अलावा, आराम का समय भी बदला गया है। पहले कर्मचारियों को हर 5 घंटे बाद ब्रेक मिलता था, अब यह ब्रेक 6 घंटे काम करने के बाद मिलेगा। इतना ही नहीं, ओवरटाइम की सीमा भी बढ़ा दी गई है। जहां पहले प्रति तिमाही 115 घंटे ओवरटाइम की अनुमति थी, अब इसे 144 घंटे कर दिया गया है। हालांकि, ओवरटाइम के लिए कर्मचारियों की लिखित सहमति लेना अनिवार्य होगा।

फैसले के बाद मुंबई और महाराष्ट्र के अन्य हिस्सों में प्राइवेट सेक्टर से जुड़े लोगों में असंतोष देखा जा रहा है। कई युवा और नौकरीपेशा लोगों का कहना है कि 12 घंटे तक काम करने से उनके पारिवारिक जीवन पर असर पड़ेगा। लंबे कार्य घंटे न केवल रिश्तों के लिए चुनौती साबित होंगे, बल्कि यह मानसिक स्वास्थ्य के लिए भी नुकसानदायक होंगे। विशेषज्ञों का मानना है कि लगातार ज्यादा समय तक काम करने से तनाव, थकान और स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं तेजी से बढ़ सकती हैं। वहीं, कर्मचारियों के बीच यह भी सवाल उठ रहा है कि कंपनियां ओवरटाइम का उचित भुगतान करेंगी या नहीं।

इस बीच, मजदूर संगठनों ने भी सरकार के फैसले पर अपनी प्रतिक्रिया दी है। धड़क कामगार यूनियन के अध्यक्ष अभिजीत राणे ने कहा है कि अगर कर्मचारियों से ज्यादा समय तक काम कराया जाएगा तो उन्हें अतिरिक्त भत्ते और बेहतर सुविधाएं भी मिलनी चाहिए। उन्होंने मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से अपील की है कि इस नियम को लागू करने से पहले कर्मचारियों के हितों का भी ध्यान रखा जाए। राणे ने साथ ही यह मांग भी की है कि रोजगार सुरक्षा सुनिश्चित की जाए और स्टार्टअप कंपनियों को प्रोत्साहित किया जाए, ताकि राज्य के युवाओं को ज्यादा रोजगार के अवसर मिल सकें।

कुल मिलाकर, महाराष्ट्र सरकार का यह फैसला अब बहस का विषय बन गया है। एक ओर सरकार इसे आर्थिक मजबूती और उत्पादकता से जोड़कर देख रही है, वहीं दूसरी ओर कर्मचारी संगठनों और आम नौकरीपेशा लोगों का कहना है कि इससे उनकी जिंदगी और मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ेगा। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार इस नियम पर कितनी सख्ती से अमल कराती है और कर्मचारियों की चिंताओं को दूर करने के लिए क्या कदम उठाए जाते हैं।

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