April 26, 2026

फूड डिलीवरी के नाम पर हो रही है लूट, Swiggy का बिल रेस्टोरेंट से 80% महंगा; ऐसे खुली पोल

ऑनलाइन फूड डिलीवरी आजकल लोगों की दिनचर्या का अहम हिस्सा बन चुकी है। लेकिन इसी सुविधा के नाम पर ग्राहकों से भारी-भरकम कीमत वसूलने के मामले लगातार सामने आ रहे हैं। हाल ही में एक सोशल मीडिया यूजर ने खुलासा किया कि स्विगी ऐप पर ऑर्डर किया गया वही खाना, रेस्टोरेंट से सीधे खरीदने पर लगभग 80 प्रतिशत सस्ता पड़ता है। ग्राहक का कहना है कि उसने जो खाना ऐप से मंगाया, उसका बिल 1,473 रुपये आया, जबकि रेस्टोरेंट से वही खाना लेने पर सिर्फ 810 रुपये खर्च होते। यह फर्क इतना चौंकाने वाला है कि लोगों के बीच बहस छिड़ गई।

ग्राहक ने अपने पोस्ट में विस्तार से कीमतों का अंतर भी बताया। उसके अनुसार, 10 पराठों का रेस्टोरेंट बिल 180 रुपये था, जबकि स्विगी पर वही 350 रुपये का पड़ा। चिकन 65 रेस्टोरेंट में 150 रुपये में मिलता है, लेकिन ऐप पर इसकी कीमत 240 रुपये थी। वहीं चिकन लॉलीपॉप की कीमत रेस्टोरेंट में 200 रुपये थी, जबकि स्विगी पर वही 320 रुपये की हो गई। इसी तरह चिकन थोक्कू बिरयानी रेस्टोरेंट में 280 रुपये की थी, पर ऐप पर यह 460 रुपये में लिस्टेड थी। यानी यह अंतर सिर्फ डिलीवरी चार्ज का नहीं था, बल्कि रेस्टोरेंट और ऐप, दोनों स्तर पर कीमतों में भारी बढ़ोतरी की गई थी।

इस मामले के सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर लोगों की तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं। कई यूजर्स का कहना था कि स्विगी और जोमैटो जैसी कंपनियां बाजार में लगभग एकाधिकार की स्थिति बना चुकी हैं, जिसकी वजह से उन्हें मनमाने दाम वसूलने की आजादी मिलती है। कुछ लोगों का मानना है कि असली खेल रेस्टोरेंट्स का है, क्योंकि वे ऑनलाइन मेन्यू की कीमतें जानबूझकर बढ़ा देते हैं। वहीं, कंपनी अलग से डिलीवरी फीस और सर्विस चार्ज जोड़ देती है। इस वजह से ग्राहक को असल कीमत से दोगुना तक भुगतान करना पड़ता है।

फूड डिलीवरी कंपनियों की दलील है कि वे कीमतें खुद तय नहीं करतीं। रेस्टोरेंट्स को ऑनलाइन और ऑफलाइन रेट अलग रखने की पूरी स्वतंत्रता होती है। इस मॉडल में रेस्टोरेंट्स ऑनलाइन दाम ज्यादा रखकर अपने मार्जिन बढ़ा लेते हैं। वहीं, ऐप की तरफ से डिलीवरी चार्ज, पैकेजिंग चार्ज और टैक्स जोड़ने के बाद कुल बिल और भी ज्यादा हो जाता है। यानी ऑनलाइन खाना सिर्फ सुविधा की वजह से नहीं, बल्कि व्यावसायिक मॉडल की वजह से भी महंगा होता है।

यह मामला उन ग्राहकों के लिए आंखें खोलने वाला है, जो रोजाना फूड डिलीवरी ऐप्स पर निर्भर रहते हैं। सवाल यह है कि सुविधा के नाम पर इतना ज्यादा अतिरिक्त भुगतान वाजिब है या नहीं। साथ ही, क्या सरकार या नियामक संस्थाओं को इस पर कड़ा रुख अपनाना चाहिए ताकि ग्राहकों को रेस्टोरेंट और ऐप्स के मिलेजुले खेल से राहत मिल सके। अभी तक कंपनियों की ओर से कोई स्पष्ट जवाब नहीं आया है, लेकिन इस मामले ने ऑनलाइन फूड डिलीवरी के बिजनेस मॉडल पर गंभीर सवाल जरूर खड़े कर दिए हैं।

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