आवारा कुत्तों पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई, आदेश सुरक्षित
सुप्रीम कोर्ट में आवारा कुत्तों को लेकर हालिया आदेश पर बुधवार को अहम सुनवाई हुई। अदालत ने पहले दिए गए फैसले — जिसमें सड़कों से कुत्तों को हटाकर शेल्टर होम में रखने का निर्देश था — पर पुनर्विचार की प्रक्रिया शुरू की है। सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि बहुमत उन लोगों का है जो आवारा कुत्तों से पीड़ित हैं, और आंकड़े इस खतरे की गंभीरता को दर्शाते हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि किसी को जानवरों से नफरत नहीं है, लेकिन सभी को घरों में रखना संभव नहीं।
एसजी ने अदालत को बताया कि 2024 में देशभर में कुत्तों के काटने के 37 लाख मामले दर्ज किए गए, जिनमें 305 लोगों की मौत रेबीज के कारण हुई। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मॉडल के अनुसार, वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक हो सकती है। उन्होंने कहा कि नसबंदी और टीकाकरण के बावजूद रेबीज का खतरा बना हुआ है और बच्चों के खुले में खेलने पर हमले की घटनाएं हो रही हैं। उनके अनुसार, यह स्थिति तत्काल समाधान की मांग करती है।
दूसरी ओर, वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने आदेश पर रोक लगाने की मांग की। उन्होंने कहा कि बिना नोटिस स्वतः संज्ञान लेकर आदेश जारी करना उचित नहीं है। सिब्बल ने दलील दी कि शेल्टर की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है, और जहां हैं भी, वहां भीड़ के कारण कुत्ते और खतरनाक हो सकते हैं। वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने भी कहा कि प्रस्तुत किए गए आंकड़ों के आधार पर डर की जो तस्वीर पेश की जा रही है, वह पूरी तरह सही नहीं है और नियमों की अनदेखी की जा रही है।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली सरकार से पूछा कि इस संबंध में उनके नियम लागू करने की स्थिति क्या है। जस्टिस नाथ ने टिप्पणी की कि यह समस्या स्थानीय निकायों की निष्क्रियता के कारण बढ़ी है, और अधिकारियों को जिम्मेदारी लेनी चाहिए। अदालत ने फिलहाल कोई अंतिम आदेश पारित नहीं किया है और कहा है कि हर पहलू पर विचार करने के बाद ही अंतरिम आदेश जारी किया जाएगा।
मामले में कई वकीलों और संगठनों ने हालिया आदेश का विरोध किया है, जबकि दूसरी ओर प्रभावित नागरिकों ने कुत्तों को लेकर बढ़ते खतरों पर चिंता जताई है। अदालत अब इस संवेदनशील मुद्दे पर संतुलित समाधान निकालने की कोशिश करेगी, ताकि इंसानों की सुरक्षा और पशु अधिकार दोनों का ध्यान रखा जा सके।
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