May 5, 2026

भारत-ब्रिटेन एफटीए पर बनी सहमति की ओर बढ़ते कदम, पीएम मोदी की यात्रा से पहले अंतिम रूप देने की कोशिश

भारत और ब्रिटेन के बीच लंबे समय से लंबित मुक्त व्यापार समझौते (FTA) को लेकर हलचल तेज हो गई है। दोनों देशों के वरिष्ठ अधिकारी इस सप्ताह गुरुवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ब्रिटिश प्रधानमंत्री कीयर स्टार्मर के बीच होने वाली बैठक से पहले समझौते को अंतिम रूप देने में जुटे हैं। कोशिश की जा रही है कि बुधवार तक सभी शुल्‍क संबंधी विवादित मुद्दों पर सहमति बन जाए, ताकि लंदन में होने वाली द्विपक्षीय मुलाकात के दौरान दोनों प्रधानमंत्रियों के सामने एफटीए के दस्तावेजों पर हस्ताक्षर संभव हो सके।

 

यह समझौता दोनों देशों के आर्थिक संबंधों को नई ऊंचाइयों पर ले जाने की दिशा में बड़ा कदम होगा। मई 2025 में ही दोनों नेताओं ने सार्वजनिक तौर पर एफटीए पर जल्द हस्ताक्षर किए जाने की घोषणा की थी। इसके बाद से दोनों देशों की टीमों के बीच तकनीकी और नीतिगत चर्चाएं लगातार जारी हैं। व्यापार और निवेश के कई बिंदुओं पर सहमति बन चुकी है, हालांकि कुछ मसले अब भी चर्चा में हैं।

 

हालांकि, पीएम मोदी की इस यात्रा के दौरान एक और महत्वपूर्ण मुद्दा रूस से ऊर्जा खरीद पर ब्रिटेन और यूरोपीय संघ द्वारा लगाए गए हालिया प्रतिबंध भी रहेगा। भारत इस मुद्दे पर पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि वह अपनी ऊर्जा जरूरतों के मामले में कोई समझौता नहीं करेगा। पीएम मोदी इस विषय पर ब्रिटिश नेतृत्व के सामने भारत की नीति और प्राथमिकताओं को मजबूती से रखेंगे। भारत का रुख है कि ऊर्जा सुरक्षा उसके लिए सर्वोपरि है और इस पर किसी भी प्रकार का दोहरा मापदंड स्वीकार नहीं किया जा सकता।

 

इस यात्रा को लेकर विदेश सचिव विक्रम मिसरी ने जानकारी दी कि प्रधानमंत्री मोदी मंगलवार देर रात लंदन के लिए रवाना होंगे। यह उनकी चौथी ब्रिटेन यात्रा होगी, और इसे दोनों देशों के रिश्तों की दृष्टि से बेहद अहम माना जा रहा है। उन्होंने बताया कि एफटीए के मसौदे को अंतिम रूप देने की प्रक्रिया मई में शुरू हो गई थी और अब यह अंतिम चरण में है।

 

गौरतलब है कि बीते सप्ताह यूरोपीय संघ और ब्रिटेन ने रूस से तेल और गैस की खरीद को लेकर नए प्रतिबंधों की घोषणा की थी। इसमें रूस द्वारा निर्धारित ऊर्जा कीमत को कम किया गया है और इससे अधिक कीमत देने वाले देशों पर भी अप्रत्यक्ष दबाव बनाने की कोशिश की गई है। भारत इन शर्तों को स्वीकार करने के मूड में नहीं है, और इसे अपनी ऊर्जा नीति में हस्तक्षेप के रूप में देख रहा है।

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