छोटे दुकानदारों पर भारी पड़ रहा क्विक कॉमर्स, ब्लिंकिट-इंस्टामार्ट जैसी कंपनियों ने 2024-25 में किए ₹64,000 करोड़ के ऑर्डर
देश में तेजी से बढ़ते क्विक कॉमर्स बिजनेस ने छोटे दुकानदारों की कमर तोड़नी शुरू कर दी है। एक ओर जहां मोहल्ले की किराना दुकानें ग्राहकों के इंतजार में खाली पड़ी हैं, वहीं दूसरी ओर ब्लिंकिट, इंस्टामार्ट, जेप्टो और फ्लिपकार्ट मिनी जैसे ऑनलाइन प्लेटफॉर्म हर दिन हजारों ऑर्डर डिलीवर कर रहे हैं।
ताजा रिपोर्ट में सामने आया है कि बीते वित्त वर्ष 2024-25 में इन कंपनियों को कुल ₹64,000 करोड़ के ऑर्डर मिले, जो पिछले साल के मुकाबले दोगुना से भी ज्यादा है। 2023-24 में यह आंकड़ा मात्र ₹30,000 करोड़ था।
2027-28 तक 2 लाख करोड़ रुपये का हो सकता है बाजार
घरेलू रेटिंग एजेंसी CARE Ratings की यूनिट द्वारा जारी रिपोर्ट के अनुसार, क्विक कॉमर्स कंपनियों की ग्रोथ रफ्तार इतनी तेज है कि 2027-28 तक इनकी ग्रॉस ऑर्डर वैल्यू (GOV) ₹2 लाख करोड़ तक पहुंच सकती है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि
> “2021-22 में जहां इन कंपनियों ने मात्र ₹450 करोड़ शुल्क के रूप में कमाए थे, वहीं 2024-25 में ये आंकड़ा ₹10,500 करोड़ पहुंच गया है। अनुमान है कि 2027-28 तक यह बढ़कर ₹34,500 करोड़ हो सकता है।”
प्रॉफिट पर फोकस, लेकिन मंडी में हाहाकार
अब ये कंपनियां सिर्फ ग्रोथ पर नहीं, प्रॉफिटेबिलिटी पर ध्यान दे रही हैं। इसके लिए
– विज्ञापन से कमाई
– निजी ब्रांड्स की पेशकश
– AI-बेस्ड स्टॉक मैनेजमेंट
जैसे मॉडल को अपनाया जा रहा है।
हालांकि रिपोर्ट यह भी स्वीकार करती है कि देश की ग्रोसरी डिमांड का अभी केवल 1% हिस्सा ही इन कंपनियों के पास है। इसका मतलब है कि आगे चलकर ये कंपनियां और ज्यादा हिस्सेदारी हथियाने की कोशिश करेंगी—और यही बात छोटे दुकानदारों के लिए और चिंता बढ़ा रही है।
छोटे व्यापारियों की रोज़ी पर संकट
किराना और स्थानीय दुकानदारों के लिए यह एक बड़ी चुनौती बन चुकी है। जहां पहले ग्राहक पास की दुकान पर जाते थे, वहीं अब “10 मिनट में डिलीवरी” का लालच उन्हें डिजिटल प्लेटफॉर्म्स की ओर खींच रहा है।
सरकार और नीति-निर्माताओं के सामने यह बड़ा सवाल बन गया है कि इस बढ़ते डिजिटल कब्ज़े के बीच पारंपरिक दुकानदारों की आजीविका कैसे बचाई जाए।
क्विक कॉमर्स भारत में तेजी से फैल रहा है और इसकी रफ्तार देखते हुए लगता है कि आने वाले कुछ सालों में यह रिटेल सेक्टर का बड़ा हिस्सा कब्जा कर सकता है। पर इसका खामियाजा छोटे दुकानदारों को भुगतना पड़ रहा है, जिनकी दुकानें अब खाली होती जा रही हैं। अब देखना यह होगा कि नीति नियंता इस असंतुलन को संतुलित करने के लिए क्या कदम उठाते हैं।
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