Metro… In Dino Review: बारिश की नमी, रिश्तों की कसक और संगीत की रूहानी धुन… अनुराग बसु की ये फिल्म एक एहसास बन जाती है
मुंबई की भीगी सड़कों और खिड़की पर गिरती बूंदों के बीच ‘मेट्रो…इन दिनों’ का अनुभव किसी शांत लेकिन गहरे सफर पर निकलने जैसा है। अनुराग बसु निर्देशित यह फिल्म सिर्फ एक रोमांटिक एंथोलॉजी नहीं, बल्कि रिश्तों, अफसोस, समझौतों और नई शुरुआतों का कोलाज है, जो बिना चीखे-चिल्लाए आपके भीतर उतरती है।
कहानी और किरदारों की परतें
फिल्म कई कहानियों की माला है, जिसमें हर मोती अपनी जगह अहम है। कोंकणा सेन शर्मा और पंकज त्रिपाठी की कहानी सबसे सशक्त है — एक शादी, जो अब सिर्फ साथ रहने भर का समझौता बन चुकी है, लेकिन फिर भी उसमें वो चुप्पियां हैं जो बहुत कुछ कहती हैं। दोनों की परफॉर्मेंस इतनी सधी हुई है कि दृश्य खत्म होने के बाद भी असर बना रहता है।
नीना गुप्ता और शाश्वत चटर्जी जैसे वरिष्ठ कलाकार रिश्तों की दो पीढ़ियों की सोच को सामने रखते हैं — एक जो चुपचाप सहती रही, दूसरी जो अब खामोश नहीं रहना चाहती। वहीं दूसरी ओर, सारा अली खान और आदित्य रॉय कपूर का रिश्ता उलझा हुआ है, भावनात्मक रूप से अस्थिर लेकिन कहीं न कहीं ठहरा हुआ भी। सारा इस बार थोड़ा बेहतर हैं, मगर आदित्य का संतुलित अभिनय उन पर भारी पड़ता है।
अली फज़ल और फातिमा सना शेख की कहानी उन अधूरे रिश्तों की परत खोलती है, जो टूटने के बाद भी पूरी तरह खत्म नहीं होते। दोनों का काम गहराई लिए हुए है। इनके मुकाबले, नीना गुप्ता और अनुपम खेर की जोड़ी एक सुखद ठहराव देती है — दो उम्रदराज लोग, जो फिर से जीना सीख रहे हैं।
संगीत – फिल्म की धड़कन
प्रीतम, पापोन और राघव चैतन्य ने फिल्म के संगीत को रूह की तरह बुना है। कोई भी गाना अतिरिक्त या बोझिल नहीं लगता, बल्कि हर गीत कहानी को आगे बढ़ाता है। बैकग्राउंड स्कोर मानसून की तरह सीन में धीरे-धीरे घुलता है।
निर्देशन – अनुराग बसु की खास शैली
अनुराग बसु एक बार फिर साबित करते हैं कि वो इंसानी रिश्तों की पेचीदगियों को सबसे शांत, सधे और प्रभावशाली ढंग से पर्दे पर लाने में माहिर हैं। वो परफेक्ट इंसानों की कहानी नहीं कहते — बल्कि अपूर्ण और गलतियों से भरे लोगों की कहानियां दिखाते हैं, जिन्हें हम असल जिंदगी में जानते हैं, जिनसे हम खुद को जोड़ पाते हैं।
कमजोरियां भी हैं, मगर नज़रअंदाज़ की जा सकती हैं
कुछ कहानियों में क्लोजर की कमी खलती है, कुछ किरदार जैसे शाश्वत चटर्जी और सारा अली खान के कैरेक्टर को और गहराई दी जा सकती थी। लेकिन ये कमियां इतनी बड़ी नहीं लगतीं कि फिल्म की आत्मा को प्रभावित कर सकें।
क्या आपको देखनी चाहिए यह फिल्म?
अगर आप उन दर्शकों में हैं जो ‘स्टोरी विद ट्विस्ट’ या हाइपर ड्रामा तलाशते हैं, तो शायद ये फिल्म आपको धीमी लग सकती है। लेकिन अगर आप भावनाओं की बारीकी, रिश्तों की नमी और इंसान के भीतर चलती लड़ाइयों को समझना चाहते हैं — तो ‘मेट्रो…इन दिनों’ आपके लिए है।
रेटिंग: (4/5)
यह फिल्म भी शायद अधूरी है, जैसे ज़िंदगी अधूरी होती है। लेकिन उसी अधूरेपन में इसकी खूबसूरती छिपी है। जब फिल्म खत्म होती है, तो आपके मन में बस एक ही ख्याल आता है — “काश थोड़ी और चलती…”
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