मां मूवी रिव्यू: पौराणिक डर और मातृत्व की ताक़त का सिनेमाई संगम, काजोल ने फिर दिखाया अभिनय का जादू
काजोल की बहुप्रतीक्षित हॉरर फिल्म ‘मां’ आज सिनेमाघरों में रिलीज़ हो चुकी है और दर्शकों के रोंगटे खड़े करने में कामयाब भी रही है। निर्देशक विशाल फुरिया ने इस फिल्म के ज़रिए यह साबित किया है कि सस्पेंस और डर को बिना लाउड बनाए भी प्रभावशाली तरीके से दिखाया जा सकता है। अजय देवगन और ज्योति देशपांडे द्वारा निर्मित यह फिल्म ‘शैतान’ के बाद एक और साहसिक प्रयास है, जहां इस बार मुख्य भूमिका में काजोल मातृत्व की पराकाष्ठा को जीवंत करती हैं।
कहानी की बुनावट और रहस्य की परतें
फिल्म की कहानी अंबिका (काजोल) के इर्द-गिर्द घूमती है, जो अपनी बेटी और पति के साथ शहर में रहती हैं, लेकिन उनकी जड़ें एक रहस्यमय गांव चंद्रपुर से जुड़ी हैं। पति शुवांकर (इंद्रनील सेनगुप्ता) गांव जाने से बचते हैं, और बेटी को भी गांव के अतीत से दूर रखते हैं। जब एक पारिवारिक संकट उन्हें गांव लौटने पर मजबूर करता है और वे वापस नहीं लौटते, तो अंबिका अपनी बेटी के साथ गांव जाती है। वहां का रहस्य, अतीत की भयावहता और एक देवी-राक्षस ‘अम्सजा’ की पौराणिक गाथा धीरे-धीरे सामने आती है।
काजोल: फिल्म की आत्मा
अंबिका के रूप में काजोल का अभिनय बेहद दमदार है। एक डरी हुई मां से लेकर एक साहसी योद्धा तक का उनका ट्रांसफॉर्मेशन बेहद असरदार है। फिल्म का दूसरा भाग काजोल के इमोशनल और फिजिकल परफॉर्मेंस पर पूरी तरह टिका हुआ है, और उन्होंने एक-एक फ्रेम में अपनी मौजूदगी दर्ज कराई है। डर और ममता के भावों को संतुलन के साथ निभाना उनकी सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरता है।
निर्देशन और लेखन का संतुलन
फिल्म का लेखन साईविन क्वाड्रास का है, जो पौराणिक कथाओं और सामाजिक प्रतीकों को मिलाकर एक नया रूप रचते हैं। फिल्म में रक्तबीज, देवी काली, और अम्सजा जैसे गूढ़ तत्वों को आधुनिक दृश्य रचना में ढालना काबिल-ए-तारीफ है। विशाल फुरिया का निर्देशन ‘छोरी 2’ की तुलना में ज्यादा परिपक्व और कंट्रोल्ड है। फिल्म में लाल रंग का सिम्बॉलिज्म, पौराणिक पूजा विधियों का सिनेमाई चित्रण और प्रतीकात्मक शॉट्स फिल्म की गहराई को बढ़ाते हैं।
बाकी कलाकारों का योगदान
रोनित रॉय ने सीमित लेकिन दमदार भूमिका निभाई है। इंद्रनील सेनगुप्ता अपनी छोटी भूमिका में भी प्रभाव छोड़ते हैं। खेरिन शर्मा (श्वेता) की कास्टिंग थोड़ी कमजोर रही – उनके चेहरे पर एक जैसे भाव बने रहते हैं, जिससे किरदार से जुड़ना मुश्किल हो जाता है।
फाइनल वर्डिक्ट
‘मां’ एक इमोशनल हॉरर फिल्म है, जिसमें न केवल डर है, बल्कि मां के संघर्ष, शक्ति और साहस की गहराई भी है। वीएफएक्स कभी-कभी कमजोर लगता है, लेकिन दमदार लेखन और सशक्त अभिनय इस कमी की भरपाई कर देते हैं।
स्टार रेटिंग: ★★★½ (3.5/5)
अगर आप सिर्फ चीख-चिल्लाहट वाली डरावनी फिल्मों से ऊपर कुछ सार्थक, पौराणिक और भावनात्मक देखना चाहते हैं — तो ‘मां’ को थिएटर में देखना आपके लिए एक बेहतरीन अनुभव हो सकता है।
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