ईरान का होर्मुज फैसला बन सकता है तेल संकट का कारण, भारत पर होगा बड़ा असर
ईरान और इज़राइल के बीच तेज़ होते युद्ध के बीच ईरानी संसद ने एक बड़ा कदम उठाया है। संसद ने दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल व्यापार मार्गों में से एक — स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को बंद करने का प्रस्ताव पारित किया है। भले ही अभी अंतिम मंज़ूरी बाकी है, लेकिन इस घोषणा के बाद ही क्रूड ऑयल की कीमतों में 2% की तेज़ी देखी गई है। भारत जैसे आयात-निर्भर देश के लिए यह स्थिति गंभीर आर्थिक चुनौती खड़ी कर सकती है।
होर्मुज स्ट्रेट क्यों है महत्वपूर्ण?
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज वह समुद्री मार्ग है जिससे होकर विश्व का लगभग 20% कच्चा तेल सप्लाई होता है। अमेरिका, यूरोप, अफ्रीका और एशिया के कई देशों के लिए यह लाइफ़लाइन है। ICRA की रिपोर्ट के अनुसार, 2024 में सबसे ज़्यादा तेल आयात चीन और जापान ने इसी मार्ग से किया था।
तेल की कीमतों में आग
23 जून 2025 को भारत में क्रूड ऑयल की कीमत बढ़कर ₹6,525 प्रति बैरल पहुंच गई, जो कि पिछले दिन के मुकाबले ₹120 प्रति बैरल की बढ़ोतरी है। अगर होर्मुज बंद करने का प्रस्ताव अंतिम रूप से पास हो जाता है, तो कीमतों में और ज़बरदस्त उछाल आ सकता है।
1. तेल आयात बिल बढ़ेगा
भारत अपनी तेल ज़रूरतों का 45-50% आयात इराक, सऊदी अरब, कुवैत और UAE जैसे खाड़ी देशों से करता है, जिनकी सप्लाई होर्मुज के रास्ते होती है।
अगर क्रूड की कीमत 10 डॉलर प्रति बैरल बढ़ती है, तो भारत का सालाना आयात बिल $13-14 अरब डॉलर तक बढ़ सकता है।
इससे चालू खाता घाटा (CAD) GDP का 0.3% तक बढ़ सकता है।
2. रुपये पर दबाव बढ़ेगा
CAD बढ़ने से रुपये की कीमत डॉलर के मुकाबले कमजोर हो सकती है, जिससे इंपोर्ट महंगा और महंगाई और ज्यादा हो सकती है।
3. महंगाई पर असर
हर 10% क्रूड बढ़ने से थोक महंगाई (WPI) 0.8-1% और खुदरा महंगाई (CPI) 0.2-0.3% तक बढ़ सकती है।
इसका सीधा असर ट्रांसपोर्ट, मैन्युफैक्चरिंग और रोजमर्रा की ज़रूरतों पर पड़ेगा।
4. GDP ग्रोथ को झटका
ICRA के अनुसार, अगर 2026 तक कच्चे तेल की औसत कीमत 80-90 डॉलर प्रति बैरल रहती है, तो GDP ग्रोथ अनुमान घटकर 6.2% तक आ सकता है।
ईरान का यह कदम न सिर्फ ग्लोबल एनर्जी सप्लाई को संकट में डाल सकता है, बल्कि भारत की आर्थिक स्थिरता पर भी बड़ा खतरा बन सकता है। अगर होर्मुज बंद होता है और अमेरिका सहित पश्चिमी देशों की प्रतिक्रिया और तेज़ होती है, तो तेल की कीमतें अनियंत्रित हो सकती हैं — जिसका खामियाजा भारत को ज्यादा महंगाई, रुपये में गिरावट और धीमी विकास दर के रूप में भुगतना पड़ सकता है।
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