April 21, 2026

पटाखा फैक्टरी ब्लास्ट: गरीबी मिटाने पंजाब आए थे, मौत बाँध कर ले गई ताबूत में…

पंजाब के मुक्तसर ज़िले में हुआ पटाखा फैक्टरी ब्लास्ट किसी साधारण दुर्घटना की तरह नहीं देखा जा सकता। यह हादसा उस सिस्टम की पोल खोलता है, जहां न नियमों की कद्र होती है, न इंसानी ज़िंदगियों की कीमत बची है। यूपी के अलीगढ़ से पंजाब भेजे गए जिन युवा मजदूरों से घरवालों को उम्मीद थी कि वे रोटी-कपड़ा और सम्मान के साथ लौटेंगे, वे अब सिर्फ ताबूतों में लौटे।

घटना 30 मई की है, जगह – पंजाब का मुक्तसर ज़िला, सिंघेवाला गांव। यहीं आम आदमी पार्टी के एक स्थानीय कार्यकर्ता तरसेम सिंह की अवैध पटाखा फैक्टरी चल रही थी। किसी को कानों-कान खबर नहीं थी कि इस छोटी-सी फैक्टरी में रोज़ मौत का सामान बनता है। और फिर, एक धमाका – इतना भीषण कि पूरी फैक्टरी राख हो गई, और साथ ही खत्म हो गए पांच नौजवानों के सपने, उनका भविष्य और उनका वजूद।

मरने वालों में शैलेंद्र सिंह, राहुल, अखिलेश, नीरज और दानवीर शामिल हैं – सभी अलीगढ़ के रहने वाले। उनके परिवारवालों को जब ये खबर मिली, तो जैसे किसी ने ज़िंदा जला दिया हो। शनिवार को वे गिद्दड़बाहा सिविल अस्पताल की मोर्चरी के बाहर पहुंचे, जहां उनके बच्चों के शव रखे थे – पोस्टमार्टम के इंतज़ार में। वे बार-बार एक ही सवाल दोहरा रहे थे – “हमने तो अपने बच्चों को पंजाब कमाने भेजा था, मौत लेने नहीं…”

परिजनों का आरोप है कि उन्हें ये तक नहीं बताया गया कि उनके बच्चे पटाखा फैक्टरी में काम कर रहे हैं। लेबर ठेकेदार राजकुमार, जो खुद अलीगढ़ का ही रहने वाला है, उन्हें बहला-फुसलाकर पंजाब ले गया। कहा गया कि अच्छी तनख्वाह मिलेगी, रहना-खाना मिलेगा। कुछ परिवारों के सदस्य दो महीने पहले गए थे, कुछ हाल ही में। लेकिन हकीकत यह थी कि उन्हें किसी खतरनाक ज़गह भेजा गया – जहां न सुरक्षा थी, न कोई नियम, और न कोई ज़िम्मेदार मालिक।

फैक्टरी का मालिक तरसेम सिंह – जो राजनीतिक रसूख रखता है – उस पर अभी तक कोई बड़ी कार्रवाई नहीं हुई। परिजन चीख-चीख कर कह रहे हैं – “यह हत्या है, हादसा नहीं।” लेकिन अफ़सोस, उनकी आवाज़ों की गूंज सरकारी गलियारों में दब कर रह जाती है।

सबसे भयावह बात यह रही कि परिजनों के पास इतना भी पैसा नहीं था कि वे अपने बच्चों के शवों को अलीगढ़ वापस ले जा सकें। उन्होंने प्रशासन से मदद की गुहार लगाई। पहले तो समाजसेवी संस्थाओं से एंबुलेंस देने को कहा गया, लेकिन दूरी का हवाला देकर उन्होंने मना कर दिया। अंततः प्रशासन हरकत में आया और देर शाम शवों को एंबुलेंस से यूपी भेजने का प्रबंध किया गया।

ये सिर्फ एक औद्योगिक दुर्घटना नहीं है – ये एक चेतावनी है। उस लापरवाही की, उस लालच की, जो गरीबों की ज़िंदगी को यूँ ही मिट्टी में मिला देता है। जब तक ऐसे कारखानों पर सख्त कार्रवाई नहीं होगी, जब तक मजदूरों की सुरक्षा प्राथमिकता नहीं बनेगी, और जब तक जिम्मेदार रसूखदारों को जेल नहीं भेजा जाएगा – तब तक ऐसी मौतें होती रहेंगी… और उन ताबूतों से आती माताओं की चीखें हमारी संवेदनहीनता पर सवाल उठाती रहेंगी।

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