ढाका की सड़कों पर फिर सुलगने लगी चिंगारी, क्या यूनुस सरकार अंतिम दौर में है?
ढाका – बांग्लादेश एक बार फिर राजनीतिक उथलपुथल के भंवर में फंसता दिख रहा है। देश की राजधानी ढाका समेत कई बड़े शहरों में विरोध प्रदर्शनों की आग फिर से भड़कने लगी है। अंतरिम प्रधानमंत्री और नोबेल शांति पुरस्कार विजेता मोहम्मद यूनुस की सरकार के खिलाफ जनता का गुस्सा अब खुलकर सामने आ रहा है। हालात इतने तनावपूर्ण हो चुके हैं कि अमेरिका को भी अपने नागरिकों के लिए विशेष सुरक्षा चेतावनी जारी करनी पड़ी है।
गुरुवार को ढाका स्थित अमेरिकी दूतावास ने एक सख्त सिक्योरिटी एडवाइजरी जारी करते हुए कहा कि बांग्लादेश में चल रही राजनीतिक अस्थिरता के कारण बड़ी रैलियों और भीड़ से दूरी बनाकर रखना जरूरी है। अमेरिकी सरकार ने अपने नागरिकों को STEP (स्मार्ट ट्रैवलर एनरोलमेंट प्रोग्राम) में रजिस्ट्रेशन कराने की सलाह देते हुए कहा है कि किसी भी समय हालात हिंसक रूप ले सकते हैं।
यह चेतावनी ऐसे समय में आई है जब ढाका की सड़कों पर प्रदर्शनकारियों की संख्या लगातार बढ़ रही है। यूनुस के इस्तीफे की मांग जोर पकड़ चुकी है और देश के अलग-अलग हिस्सों से असंतोष की लपटें सामने आ रही हैं।
सूत्रों के अनुसार, अंतरिम सरकार के मुखिया मोहम्मद यूनुस और सेना प्रमुख जनरल वकार उज जमां के बीच गहरा तनाव चल रहा है। जमां ने हाल ही में अंतरिम सरकार के कई फैसलों पर आपत्ति जताई है। इनमें म्यांमार के साथ चल रही विवादास्पद रखाइन कॉरिडोर परियोजना और चुनावों में हो रही देरी प्रमुख हैं।
इससे पहले, प्राइमरी असिस्टेंट टीचर्स यूनिटी काउंसिल से जुड़े हजारों प्राथमिक शिक्षकों ने भी अनिश्चितकालीन राष्ट्रव्यापी हड़ताल का ऐलान कर दिया है। वहीं, पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया की पार्टी बीएनपी (बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी) ने भी अपने विरोध अभियान को फिर से तेज कर दिया है।
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि यदि यही हालात बने रहे, तो यूनुस सरकार के लिए सत्ता में बने रहना मुश्किल हो सकता है। ढाका में कई जानकार यह भी संकेत दे रहे हैं कि अमेरिका की चेतावनी सिर्फ एक औपचारिकता नहीं, बल्कि आने वाले बड़े भूचाल का संकेत है।
क्या बांग्लादेश एक और राजनीतिक परिवर्तन की ओर बढ़ रहा है? क्या सेना की भूमिका फिर से निर्णायक बनने जा रही है? और क्या मोहम्मद यूनुस के हाथ से फिसल रही है सत्ता की कमान?
इन तमाम सवालों के बीच बांग्लादेश की राजनीति एक बार फिर निर्णायक मोड़ पर खड़ी है।
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