भारत-अमेरिका ट्रेड डील को लेकर सतर्कता ज़रूरी: क्या अमेरिका बना सकता है वाणिज्यिक दबाव का अगला केंद्र?
क्या भारत को भी ब्रिटेन की तरह अमेरिका के साथ असंतुलित व्यापार समझौते की ओर धकेला जा रहा है? क्या यह समझौता राजनीतिक प्रतीकों से प्रेरित होकर भारत की रणनीतिक और आर्थिक स्थिति को प्रभावित कर सकता है? यह सवाल अब गंभीर हो चुके हैं, क्योंकि हाल ही में अमेरिका और ब्रिटेन के बीच हुआ सीमित व्यापार समझौता भारत के लिए एक चेतावनी बनकर उभरा है।
ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) ने शनिवार को कहा कि भारत को अमेरिका-ब्रिटेन व्यापार समझौते से सबक लेना चाहिए और अमेरिका के साथ किसी भी संभावित व्यापार समझौते पर अत्यंत सावधानी से आगे बढ़ना चाहिए। GTRI ने यह बयान 8 मई को अमेरिका और ब्रिटेन के बीच घोषित सीमित व्यापार समझौते के संदर्भ में दिया, जिसमें ब्रिटेन ने अमेरिका को टैरिफ में बड़ी रियायतें दी हैं, जबकि बदले में अमेरिका ने बहुत सीमित लाभ दिए हैं।
ब्रिटेन ने अमेरिका के 2,500 से अधिक उत्पादों—जैसे जैतून का तेल, एथनॉल और अन्य—पर टैरिफ में कटौती की है, जबकि अमेरिका ने महज़ 100 से कम ब्रिटिश वस्तुओं पर मामूली रियायतें दी हैं। यही नहीं, अमेरिका की दी गई रियायतें अधिकांश मामलों में टैरिफ को समाप्त करने की बजाय उसे मूल 10 प्रतिशत पर सीमित रखती हैं। इससे संकेत मिलता है कि यदि यह मॉडल अमेरिका की भविष्य की रणनीति का खाका है, तो भारत पर भी सीमित लेकिन असमान व्यापार समझौते को स्वीकार करने का दबाव बनाया जा सकता है।
GTRI ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि अमेरिका, भारत से सोयाबीन, एथनॉल, सेब, बादाम, अखरोट, किशमिश, एवोकाडो, स्पिरिट्स, आनुवंशिक रूप से संशोधित (GM) उत्पादों, और मांस व पोल्ट्री जैसे संवेदनशील कृषि उत्पादों पर टैरिफ घटाने की मांग कर सकता है। इसके अतिरिक्त, वाहनों पर भी टैरिफ रियायतें अपेक्षित हैं, जैसा कि भारत ने हाल ही में ब्रिटेन के चुनिंदा वाहनों पर टैरिफ 100% से घटाकर 10% कर दिया।
GTRI के फाउंडर अजय श्रीवास्तव ने कहा कि अमेरिका भी ब्रिटेन की तरह भारत पर बड़े स्तर पर कमर्शियल खरीद के लिए दबाव बना सकता है। इसमें तेल, एलएनजी, बोइंग विमान (सैन्य और नागरिक दोनों), हेलीकॉप्टर, और यहां तक कि परमाणु रिएक्टर जैसी रणनीतिक वस्तुएं शामिल हो सकती हैं।
उन्होंने चेतावनी दी कि भारत को अमेरिका के साथ किसी भी द्विपक्षीय व्यापार समझौते पर बातचीत करते समय हर कदम सोच-समझकर उठाना चाहिए। भारत को यह सुनिश्चित करना होगा कि ऐसा कोई भी समझौता पारस्परिक, संतुलित और व्यावसायिक हितों पर आधारित हो, न कि केवल राजनीतिक समीकरणों या प्रतीकों पर टिका हो।
यह स्पष्ट है कि अमेरिका, अपने हितों को प्राथमिकता देने वाले सीमित व्यापार समझौतों के ज़रिए अपने साझेदारों से अधिक से अधिक लाभ निकालने की रणनीति पर काम कर रहा है। ऐसे में भारत के लिए यही समय है सतर्क रहने का, ताकि वह अपने कृषि, औद्योगिक और रणनीतिक हितों की रक्षा करते हुए किसी भी व्यापार समझौते को संतुलित दिशा में ले जा सके।
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