शंघाई में तना था सन्नाटा, फिर भारतीय तीरंदाजों की तिकड़ी ने गूंजा दी जीत की गूंज—गोल्ड, सिल्वर और ब्रॉन्ज से मचाई धाक!
चीन की धरती पर जब शंघाई के मैदान में तीरों की टंकार गूंजी, तो दुनिया देखती रह गई—भारतीय तीरंदाजों ने अपने निशानों से इतिहास रच दिया। आर्चरी वर्ल्ड कप स्टेज-2 में भारत ने दमदार प्रदर्शन करते हुए गोल्ड, सिल्वर और ब्रॉन्ज अपने नाम कर लिया, और यह दिखा दिया कि एशियाई सीमाओं से परे भी भारतीय लहरें लहराने लगी हैं।
पुरुषों की कम्पाउंड टीम स्पर्धा में अभिषेक वर्मा, ओजस देवताले और ऋषभ यादव की तिकड़ी ने अपने बेहतरीन तालमेल और धैर्य से मैक्सिको को 232-228 से हराकर गोल्ड मेडल भारत की झोली में डाला। इस मुकाबले में शुरुआत से ही भारतीय तीरंदाजों ने कमान संभाली। पहले गेम में 59 अंक लेकर उन्होंने बढ़त बनाई, हालांकि दूसरे गेम में थोड़ी चूक हुई और स्कोर 115-115 की बराबरी पर आ गया। लेकिन फिर तीसरे और अंतिम राउंड में टीम ने अपने अनुभव और संयम से बाज़ी पलट दी। आखिरी राउंड में 60 में से 59 अंक जुटाकर उन्होंने जीत पर मुहर लगा दी।
हालांकि, महिलाओं की कम्पाउंड टीम स्पर्धा में भारत को सिल्वर से संतोष करना पड़ा। ज्योति सुरेखा वेन्नम, मधुरा धामनगांवकर और चिकिथा तानिपार्थी की भारतीय टीम को फाइनल में मैक्सिको के खिलाफ 221-234 से हार का सामना करना पड़ा। भारतीय महिला तिकड़ी पूरे टूर्नामेंट में शानदार रही, लेकिन फाइनल मुकाबले में मैक्सिकन टीम की धार के सामने टिक नहीं सकी। फिर भी इस स्पर्धा में भारत ने पोडियम पर मजबूत मौजूदगी दर्ज कराई।
इसके बाद भारतीय मिश्रित टीम—अभिषेक वर्मा और मधुरा धामनगांवकर—ने तीसरे स्थान के मुकाबले में मलेशिया को हराकर ब्रॉन्ज मेडल अपने नाम किया और देश को एक और गौरवपूर्ण पल दिया।
इस प्रदर्शन का सबसे खास पहलू रही मधुरा धामनगांवकर की वापसी। 24 वर्षीय मधुरा ने तीन साल बाद वर्ल्ड कप टीम में वापसी की और पहली बार कोई वर्ल्ड कप मेडल अपने नाम किया। इससे पहले उन्होंने 2022 में मेडेलिन में भारत का प्रतिनिधित्व किया था, लेकिन तब उन्हें सफलता नहीं मिली थी। इस बार न केवल वापसी की, बल्कि इतिहास भी रच दिया।
गौरतलब है कि कम्पाउंड तीरंदाजी अब 2028 के लॉस एंजिल्स ओलंपिक में डेब्यू करने जा रही है, और उसमें केवल मिश्रित टीम स्पर्धा होगी। ऐसे में यह जीत भारत के लिए केवल पदक तक सीमित नहीं है, बल्कि भविष्य के ओलंपिक सपनों की नींव है। भारतीय तीरंदाजी दल का यह प्रदर्शन न केवल पदकों की गिनती बढ़ाता है, बल्कि देश के पहले ओलंपिक तीरंदाजी मेडल की संभावनाओं को भी नई ऊंचाइयों तक पहुंचाता है।
शंघाई में मिले इन तीन पदकों ने यह साबित कर दिया कि भारतीय तीरंदाज अब दुनिया की किसी भी चुनौती को मात देने के लिए तैयार हैं—धैर्य, अभ्यास और आत्मविश्वास के साथ!
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