Jaat Movie Review: सनी देओल की किसान एक्शन फिल्म में ‘जवान’ की झलक, लेकिन स्क्रिप्ट ने किया धोखा
सनी देओल की नई फिल्म ‘जाट’ रिलीज़ हो चुकी है, लेकिन हैरानी की बात ये रही कि मुंबई जैसे बड़े बाजार में इसका प्रेस शो तक नहीं रखा गया। यहां तक कि जिन लोगों को प्रीमियर का न्योता मिला, उनसे भी गुज़ारिश की गई कि सुबह-सुबह रिव्यू न लिखें। इससे ये कयास लगाए जाने लगे कि फिल्म शायद उम्मीदों पर खरी नहीं उतरेगी। लेकिन एक्शन फिल्मों के शौकीनों के लिए राहत की बात ये है कि ‘जाट’, सनी की पिछली फिल्म ‘सिकंदर’ जितनी कमजोर नहीं है। हालांकि यह ‘जवान’ जितनी भी प्रभावशाली नहीं बन पाई है।
‘जवान’ की आत्मा, ‘जाट’ का ढांचा
फिल्म की कहानी शाहरुख खान की ब्लॉकबस्टर ‘जवान’ की आत्मा लिए हुए है—एक ईमानदार अफसर जो वर्दी की शान के साथ नहीं, बल्कि आम आदमी के लिबास में भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग लड़ता है। वह समाज की पीड़ित महिलाओं को अपनी बहन मानता है, बुजुर्ग माताओं की सेवा करता है और सबको एक वादा करता है: “संभवामि युगे युगे…” यानी हर युग में न्याय का अवतार लौटेगा।
लेकिन फिल्म वहीं कमजोर पड़ जाती है जहां उसकी स्क्रिप्ट तार्किकता से हटकर कल्पना की उड़ान भरने लगती है।
निर्देशक की अधूरी पढ़ाई बनी फिल्म की कमजोरी?
फिल्म के निर्देशक गोपीचंद मलिनेनी की समझ पर सवाल उठना लाज़मी है। अगर उन्होंने 12वीं की पढ़ाई पूरी की होती, खासकर नागरिक शास्त्र ठीक से पढ़ा होता, तो शायद ‘जाट’ की कहानी ज़मीन से ज्यादा जुड़ी होती। फिल्म में भारत की संघीय व्यवस्था को जिस तरह से दिखाया गया है, वह हकीकत से काफी दूर है। उदाहरण के लिए, केंद्रीय जांच एजेंसी CBI को फिल्म में जिस अंदाज़ में पूरे देश में मनमर्जी से छापे मारते दिखाया गया है, वो व्यवहारिक नहीं।
यह वही दौर लगता है जब मनमोहन देसाई की फिल्मों में तीन हीरो किसी दुखियारी महिला को एक साथ खून चढ़ा देते थे और दर्शक सवाल नहीं करते थे। लेकिन अब का भारत काफी जागरूक है—देश की साक्षरता दर 75 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है और लोग सिनेमा में लॉजिक की मांग करते हैं।
दक्षिण भारत में बसा ‘लंका’ और एक नई गदर
फिल्म की कहानी आंध्र प्रदेश के तटीय गांवों से शुरू होती है, जहां एक आतंकवादी, जो श्रीलंका के प्रभाकरण जैसा दिखता है, स्थानीय नागरिकता हासिल कर चुका है और आतंक का साम्राज्य खड़ा कर चुका है। उसे राजनीतिक संरक्षण मिला हुआ है और उसकी गतिविधियां एक अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क तक फैली हुई हैं। लेकिन अचरज की बात ये है कि फिल्म में न कोई मीडिया इस खबर को उठाता है और न ही सोशल मीडिया पर वायरल हुआ वीडियो किसी आम आदमी तक पहुंचता है—बल्कि सीधा उन लोगों तक पहुंचता है जिनके खिलाफ वो बनाया गया है!
‘जाट’ एक्शन और देशभक्ति के तड़के के साथ सनी देओल के फैंस के लिए एक बार देखने लायक फिल्म जरूर है। लेकिन अगर इसकी स्क्रिप्ट और रिसर्च में थोड़ा और ध्यान दिया जाता, तो ये फिल्म ‘जवान’ जैसी यादगार बन सकती थी। निर्देशक के अधूरे ज्ञान और स्क्रिप्ट की लापरवाही ने एक बेहतरीन मौके को औसत में बदल दिया।
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